53. दुश्चक्र और गुणी चक्र
दुश्चक्र और गुणी चक्र घटनाओं का एक क्रम है जहाँ एक घटना दूसरे की ओर ले जाती है और परिणामस्वरूप क्रमश: आपदा या खुशी में परिवर्तित हो जाती है। इसे उस तरह से समझने कि जरूरत है , यदि खर्च आय से अधिक है तो व्यक्ति उधार और कर्ज के जाल में फंस जाता है तो यह एक दुश्चक्र है। यदि व्यय आय से कम है , जिसके परिणामस्वरूप बचत और धन का संचय होता है तो यह एक गुणी चक्र है। श्रीकृष्ण इन चक्रों का उल्लेख श्लोक 2.62 से 2.64 में करते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं “ विषयों का चिंतन करनेवाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है , आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से अत्यन्त मूढ़भाव उत्पन्न हो जाता है , मूढ़भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है , स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष नष्ट हो जाता है ” ( 2.62-2.63) । यह पतन का दुश्चक्र है। दूसरी ओर , श्रीकृष्ण कहते हैं “ अपने अधीन किये हुए मन वाला साधक अपने वश में की हुई , राग-द्वेष से रहित इन्द्रियों द्वारा ...