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Showing posts from February, 2023

53. दुश्चक्र और गुणी चक्र

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  दुश्चक्र और गुणी चक्र घटनाओं का एक क्रम है जहाँ एक घटना दूसरे की ओर ले जाती है और परिणामस्वरूप क्रमश: आपदा या खुशी में परिवर्तित हो जाती है। इसे उस तरह से समझने कि जरूरत है , यदि खर्च आय से अधिक है तो व्यक्ति उधार और कर्ज के जाल में फंस जाता है तो यह एक दुश्चक्र है। यदि व्यय आय से कम है , जिसके परिणामस्वरूप बचत और धन का संचय होता है तो यह एक गुणी चक्र है। श्रीकृष्ण इन चक्रों का उल्लेख श्लोक 2.62 से 2.64 में करते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं “ विषयों का चिंतन करनेवाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है , आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से अत्यन्त मूढ़भाव उत्पन्न हो जाता है , मूढ़भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है , स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष नष्ट हो   जाता है ” ( 2.62-2.63) । यह पतन का दुश्चक्र है। दूसरी ओर , श्रीकृष्ण कहते हैं “ अपने अधीन किये हुए मन वाला साधक अपने वश में की हुई , राग-द्वेष से रहित इन्द्रियों द्वारा ...

52. इन्द्रियों की स्वचालितता

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  श्रीकृष्ण अर्जुन को सावधान करते हुए कहते हैं “ अशांत इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान् पुरुष के मन को भी बलपूर्वक हर लेती हैं ” ( 2.60) । यह श्लोक उत्तेजना से भरी इन्द्रियों की स्वचालितता के बारे में है। सबसे अच्छा उदाहरण एक धूम्रपान करने वाले का है जो धूम्रपान के नुकसान से अच्छी तरह अवगत है लेकिन इसे छोड़ना बेहद मुश्किल है और असलियत यह है कि जब तक उसे पता चलता है , सिगरेट पहले ही जल चुकी होती है। कोई भी जो सड़क पर हिंसक रोष में ( road rage ) या अपराध में शामिल है , यह प्रमाणित करता है कि यह क्षण भर के क्रोध में हुआ न कि जानबूझकर। ऐसा किसी के भी साथ होता है जो कार्यस्थल पर या परिवार में कठोर शब्द बोलता है और उसके बारे में पछताता रहता है क्योंकि उनका ऐसा करने का इरादा नहीं था। इन उदाहरणों का अर्थ यह है कि इन्द्रियाँ हमें अपने वश में ले लेती हैं और हमें कर्मबंधन में बांध देती हैं। हमारे प्रारंभिक वर्षों के दौरान मस्तिष्क में अप्रयुक्त न्यूरॉन चलने जैसी स्वचालित गतिविधियों की देखभाल करने के लिए हार्ड वायरिंग नामक जोड़ बनाते हैं क्योंकि यह मस्तिष्क की बहुत सारी ऊर्जा को बचात...

51. इन्द्रिय विषयों की लालसा को छोड़ना

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  श्रीकृष्ण कहते हैं “ इन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले व्यक्ति से इन्द्रिय वस्तुएँ दूर हो जाती हैं लेकिन रस (लालसा) जाती नहीं और लालसा तभी समाप्त होती है जब व्यक्ति सर्वोच्च को प्राप्त करता है ”   ( 2.59) । इन्द्रियों के दो भाग होते हैं -एक भौतिक उपकरण और दूसरा उसका नियंत्रक। मन सभी इन्द्रियों के नियंत्रक भागों का संयोजन है। श्रीकृष्ण हमें उस नियंत्रक पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह देते हैं जो लालसा को बनाए रखता है। श्रीकृष्ण ‘रस’ शब्द का उपयोग करते हैं। जैसे पके हुए फल को काटने के बाद उसे निचोड़ने तक रस दिखाई नहीं देता , दूध में मक्खन छिपा रहता है ; उसी प्रकार ‘रस’ इन्द्रियों में मौजूद उस अंतर्निहित लालसा को दर्शाता है। अज्ञान के स्तर पर इन्द्रियाँ इन्द्रिय-विषयों से आसक्त हो जाती हैं और सुख-दुःख के द्वन्द्वों में झूलती रहती हैं। अगले चरण में बाहरी परिस्थितियों के कारण इन्द्रिय-विषयों से तो दूरी बन जाती है पर लालसा बनी रहती है। उदाहरण के लिए डॉक्टर की सलाह पर हम मिठाई खाना या शराब पीना छोड़ तो देते हैं लेकिन मिठाई या शराब की चाह मन में बनी रहती है। ब...

50. समेटना ही बुद्धिमानी

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  श्रीकृष्ण कहते हैं “ कछुआ सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है , वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है , तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है ” ( 2.58) । यह इन्द्रिय-नियंत्रण पर दिए गए जोर का ही विस्तार है और यह श्लोक व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान करता है। श्रीकृष्ण इन्द्रियों के नियंत्रण पर जोर देते हैं क्योंकि ये इन्द्रियाँ हमारी अंतरात्मा और बाहरी दुनिया के बीच के द्वार हैं। वे सलाह देते हैं कि जब हमें लगे कि हम विषय-वस्तुओं से आसक्त हो रहे हैं तो हमें अपनी इन्द्रियों को उसी प्रकार समेट लेना चाहिए जैसे कोई कछुआ संकट के समय अपने अंगों को समेट लेता है। प्रत्येक इन्द्रिय के दो भाग होते हैं। पहला है इन्द्रिय-उपकरण , जैसे नेत्रगोलक और दूसरा है मस्तिष्क का वह नियंत्रक भाग जो उस नेत्रगोलक को संचालित करता है। संवेदी संपर्क दो स्तरों पर होते हैं। पहला स्तर है इन्द्रिय-वस्तुओं की हमेशा बदलती बाहरी दुनिया और इन्द्रिय-उपकरण जैसे नेत्रगोलक के बीच। यह पूरी तरह स्वचालित होता है जहाँ फोटॉन नेत्रगोलक तक पहुँचते हैं और अपनी भौतिक विशेषताओं के अ...

49. घृणा भी एक बंधन है

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  हम किसी परिस्थिति , कार्य के परिणाम या व्यक्ति को अच्छे या बुरे  के रूप में वर्गीकरण करने के आदी हैं। एक तीसरा विकल्प भी है , कोई वर्गीकरण न करना अर्थात् तटस्थ रहना। श्रीकृष्ण इस तीसरी अवस्था का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि बुद्धिमान् व्यक्ति वह है जो शुभ की प्राप्ति पर खुशी से नहीं भरता है और न ही वह अशुभ से घृणा करता है। वह हमेशा बिना आसक्ति के रहता है ( 2.57) । यह श्रीकृष्ण के उस उपदेश का ही विस्तार है कि बुद्धिमान् व्यक्ति शुभ और अशुभ दोनों कर्मों का त्याग कर देता है (2.50)। इसका तात्पर्य यह है कि स्थितप्रज्ञ विभाजन को छोड़ देता है और तथ्यों को तथ्यों के रूप में लेता है क्योंकि विभाजन सुख और दु:ख की द्वन्द्वों का जन्मस्थान है। इस श्लोक का आचरण कठिन है क्योंकि यह तथ्यों को तुरंत अच्छे या बुरे के रूप में विभाजन करने की हमारी प्रवृत्ति के विपरीत है। जब कोई बुरे के रूप में चिह्नित किए गए किसी स्थिति या व्यक्ति का सामना करता है तो घृणा और विमुखता स्वचालित रूप से उत्पन्न होती है। दूसरी ओर स्थितप्रज्ञ इसे वर्गीकृत नहीं करता और इसलिए नफरत का सवाल ही नहीं उठता है। इसी प्रकार श...

48. राग, भय और क्रोध

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  श्रीकृष्ण कहते हैं स्थितप्रज्ञ वह है जो न तो सुख से लगाव रखता है और न ही दु:ख से विक्षुब्ध होता है ( 2.56) । वह राग , भय और क्रोध से मुक्त होता है। यह श्लोक 2.38 का विस्तार है जहाँ श्रीकृष्ण सुख और दु:ख ; लाभ और हानि ; और जय और पराजय को समान रूप से मानने को कहते हैं। श्रीकृष्ण उद्वेग से मुक्त रहने को अत्यन्त महत्त्व देते हुए कहते हैं कि जो भक्त न तो जगत् को उद्विग्न करता है और न ही स्वयं जगत् से उद्विग्न होता है , वह उन्हें प्रिय है ( 12.15) । हम सभी सुख की तलाश करते हैं लेकिन हमारे जीवन में दु:ख आता है क्योंकि ये दोनों द्वंद्व के रूप में स्थित रहते हैं। यह मछली पकड़ने के लिए चारे की तरह है जहाँ चारे के पीछे कांटा छिपा होता है। स्थितप्रज्ञ वह है जो इन द्वन्द्वों को पार कर द्वंद्वातीत हो जाता है। यह जागरूकता है कि जब हम एक की तलाश करते हैं तो दूसरा अनुसरण करने के लिए बाध्य होता है , भले ही किसी अलग रूप में और कुछ समय के अंतराल के बाद। जब हमें अपनी योजना के अनुसार सुख प्राप्त होता है , अहंकार प्रफुल्लित हो जाता है। लेकिन जब सुख के बाद दुःख आता है तो अहंकार को ठेस पहुँचती ...

47. स्थितप्रज्ञ आंतरिक अवस्था है

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  अर्जुन के संदेह के उत्तर में श्रीकृष्ण कहते हैं स्थितप्रज्ञ स्वयं से संतुष्ट होता है ( 2.55) । दिलचस्प बात यह है कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन के प्रश्न के दूसरे भाग का उत्तर नहीं दिया कि स्थितप्रज्ञ कैसे बोलता है , कैसे बैठता है और कैसे चलता है ? ‘ स्वयं के साथ संतुष्ट’ आंतरिक अवस्था है और बाहरी व्यवहार के आधार पर इसे पहचानने का कोई तरीका नहीं है। हो सकता है दी गई परिस्थितियों में एक अज्ञानी और एक स्थितप्रज्ञ दोनों एक ही शब्द बोल सकते हैं , एक ही तरीके से बैठ और चल सकते हैं। इस वजह से स्थितप्रज्ञ की हमारी समझ और भी जटिल हो जाती है। श्रीकृष्ण का जीवन स्थितप्रज्ञ जीवन का सर्वोत्तम उदाहरण है। जन्म के समय वह अपने माता-पिता से अलग हो गए थे। उन्हें माखन चोर के नाम से जाना जाता है। उनकी रासलीला , नृत्य और बांसुरी पौराणिक है , लेकिन जब उन्होंने वृंदावन छोड़ा तो वे रासलीला की तलाश में कभी वापस नहीं आए। वह जरूरत पड़ने पर लड़े लेकिन कई बार युद्ध से बचते रहे और इसलिए उन्हें रण-छोड़-दास के नाम से जाना जाता था। उन्होंने कई चमत्कार दिखाए और वह दोस्तों के दोस्त रहे। जब विवाह करने का समय आया तो उन्ह...