51. इन्द्रिय विषयों की लालसा को छोड़ना


 

श्रीकृष्ण कहते हैंइन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले व्यक्ति से इन्द्रिय वस्तुएँ दूर हो जाती हैं लेकिन रस (लालसा) जाती नहीं और लालसा तभी समाप्त होती है जब व्यक्ति सर्वोच्च को प्राप्त करता है  (2.59)। इन्द्रियों के दो भाग होते हैं -एक भौतिक उपकरण और दूसरा उसका नियंत्रक। मन सभी इन्द्रियों के नियंत्रक भागों का संयोजन है। श्रीकृष्ण हमें उस नियंत्रक पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह देते हैं जो लालसा को बनाए रखता है।

श्रीकृष्ण ‘रस’ शब्द का उपयोग करते हैं। जैसे पके हुए फल को काटने के बाद उसे निचोड़ने तक रस दिखाई नहीं देता, दूध में मक्खन छिपा रहता है; उसी प्रकार ‘रस’ इन्द्रियों में मौजूद उस अंतर्निहित लालसा को दर्शाता है।

अज्ञान के स्तर पर इन्द्रियाँ इन्द्रिय-विषयों से आसक्त हो जाती हैं और सुख-दुःख के द्वन्द्वों में झूलती रहती हैं। अगले चरण में बाहरी परिस्थितियों के कारण इन्द्रिय-विषयों से तो दूरी बन जाती है पर लालसा बनी रहती है। उदाहरण के लिए डॉक्टर की सलाह पर हम मिठाई खाना या शराब पीना छोड़ तो देते हैं लेकिन मिठाई या शराब की चाह मन में बनी रहती है। बाहरी परिस्थितियों में नैतिकता, ईश्वर या कानून का भय, प्रतिष्ठा खोने का डर, साधनों या धन का अभाव, वृद्धावस्था, पूर्व संस्कार आदि शामिल हो सकते हैं। श्रीकृष्ण उस अंतिम अवस्था की ओर संकेत कर रहे हैं जहाँ लालसा स्वयं ही समाप्त हो जाती है।

श्रीमद्भागवत पुराण (11.20.21) में श्रीकृष्ण एक व्यावहारिक संकेत देते हुए इन्द्रियों की तुलना घोड़ों से करते हैं जिन्हें प्रशिक्षक धीरे-धीरे साधता है। वह कुछ समय तक उनके साथ दौड़ता है, उनकी प्रवृत्तियों का निरीक्षण करता है और जब वह उन्हें पूरी तरह समझ लेता है तब उन पर अपनी इच्छा के अनुसार सवार होने लगता है।

दो महत्त्वपूर्ण बातें यहाँ ध्यान देने योग्य हैं। पहली यह कि प्रशिक्षक घोड़ों को एक ही प्रयास में नियंत्रित नहीं कर सकता क्योंकि वे उसे तुरंत गिरा देंगे। उसी प्रकार, जब तक हम इन्द्रियों के कार्य करने के तरीके को नहीं समझ लेते हम उन्हें नियंत्रित नहीं कर सकते। जब उनकी प्रवृत्तियों के प्रति जागरूकता हो जाती है तभी हम उन्हें अपने वश में ला पाते हैं। दूसरी बात यह कि इन्द्रियों के प्रभाव में रहते हुए भी हमें निरन्तर इस बात की सजगता बनाए रखनी होती है कि इन्द्रियों को नियंत्रण में रखना है।

जागरूकता और लालसा एक साथ मौजूद नहीं हो सकती। जागरूकता में हम लालसाओं की चपेट में नहीं आ सकते क्योंकि ऐसा अज्ञानता में ही होता है।


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