220. तर्क से परे
श्रीकृष्ण ने अस्तित्व की व्याख्या करते हुए कहा कि यह प्रकृति और पुरुष का संयोग है जो दोनों अनादि हैं। गुण और विकार प्रकृति से उत्पन्न होते हैं (13.20)। जबकि प्रकृति कारण और प्रभाव के लिए जिम्मेदार है , पुरुष उन्हें सुख और दुःख के द्वन्द्वों के रूप में अनुभव करता है (13.21)। श्रीकृष्ण ने आगे स्पष्ट किया कि वे नाशवान् प्रकृति से अतीत हैं और वे अविनाशी जीवात्माओं में उत्तम हैं , इसलिए उन्हें पुरुषोत्तम (परम पुरुष या परमात्मा) कहा जाता है (15.18)। यह पुनरावृत्ति हमें निम्नलिखित श्लोकों को समझने में मदद करेगी। श्रीकृष्ण कहते हैं “आसुरी स्वभाव वाले लोग कर्म और अकर्म में भेद नहीं कर पाते। उनमें न तो पवित्रता होती है , न आचरण , न सत्य ( 16.7) । वे कहते हैं कि संसार परम सत्य से रहित है , आधारहीन है , प्रभु से रहित है। यह संसार काम वासना से (स्त्री-पुरुष के पारस्परिक मिलन से) उत्पन्न हुआ है ” ( 16.8) । यह प्रकृति के स्तर पर जीवन जीना है जहाँ कारण और प्रभाव का प्रभुत्व है ; जहाँ तर्क ही हमारे अनुभव की हर चीज को परिभाषित करता है। अगला प्रश्न यह उठता है कि नाशवान् प्रकृति के स्तर पर का...