216. भय से पार पाना
भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय का शीर्षक ‘ दैव-असुर सम्पद विभाग योग ’ है। इसका अर्थ है दैवी और आसुरी स्वभावों के बीच के भेद को समझकर परमात्मा से एकत्व की प्राप्ति करना । हममें से प्रत्येक व्यक्ति में अनेक गुण होते हैं , जिन्हें दैव (दैवी) और असुर (आसुरी) कहा जा सकता है। दैव वह आंतरिक यात्रा है जो परमात्मा की ओर ले जाती है , जबकि असुर प्रवृत्ति हमें उनसे दूर ले जाती है। श्रीकृष्ण ने ‘ अभयं ’ (भय का आभाव) को दैवी गुणों में प्रथम बताया है (16.1)। यद्यपि अभयं का अर्थ सामान्यतः निर्भयता के रूप में किया जाता है , किंतु उसका भावार्थ इससे कहीं अधिक गहन है। भगवद्गीता को समझने के लिए हमें हमेशा तीसरे विकल्प को ध्यान में रखना चाहिए। जैसे कि राग और विराग से परे की तीसरी अवस्था वीत-राग है। इसी तरह , आसक्ति और विरक्ति से परे की तीसरी अवस्था अनासक्ति है। हम आसक्ति/राग या विरक्ति/विराग के द्वंद्वों से भली-भाँति परिचित हैं , लेकिन तीसरी अवस्था तक पहुँचना एक चुनौती है। ऐसा ही ' अभय ' भी है , जो भय और निर्भयता दोनों से परे है। जहाँ भय एक आंतरिक भावना की अभिव्यक्ति है , वहीं निर्भयता उस ...