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217. दान व्यापार नहीं है

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  श्रीकृष्ण ने अंतःकरण शुद्धि (आंतरिक पवित्रता) , ज्ञानयोग में दृढ़ता , दान , इन्द्रियों पर नियंत्रण , यज्ञ , स्वाध्याय (स्वयं का अध्ययन) और सत्यनिष्ठा को कुछ दैवी गुणों के रूप में वर्णित किया है (16.1)। इन्द्रियों पर नियंत्रण भगवद्गीता का एक सामान्य सूत्र है। यद्यपि इन्द्रियाँ हमारे अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं , फिर भी वे इच्छाएँ उत्पन्न करके हमें बाँधती हैं जिसके परिणामस्वरूप हम मुक्ति के दिव्य मार्ग से भटक जाते हैं। आंतरिक शुद्धता को इससे पहले अध्यात्म कहा गया है और स्वभाव (आंतरिक प्रकृति) के रूप में परिभाषित किया गया है ( 8.3) । यद्यपि सभी लोग जन्म के समय शुद्ध हो ते हैं , फिर भी बाद में समाज और परिवार द्वारा विभाजन के रूप में अशुद्धियाँ थोपी जाती हैं। परिणामस्वरूप कुछ लोगों के लिए मांसाहारी भोजन स्वीकार्य नहीं है लेकिन अन्य के लिए यह स्वीकार्य है। चचेरे भाई से विवाह करना कुछ संस्कृतियों में स्वीकार्य है और अन्य में निषिद्ध है ; एक ही परमात्मा की प्रार्थनाएँ बिल्कुल भिन्न हैं और कभी-कभी विरोधाभासी प्रतीत होती हैं ; यह सूची अंतहीन है। शुद्धता प्राप्त करना इन विभाजनों को दूर क...

216. भय से पार पाना

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    भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय का शीर्षक ‘ दैव-असुर सम्पद विभाग योग ’ है। इसका अर्थ है दैवी और आसुरी प्रवृत्ति के बीच के भेद को समझकर परमात्मा से एकत्व की प्राप्ति करना । हममें से प्रत्येक व्यक्ति में अनेक गुण होते हैं जिन्हें दैवी और असुर आसुरी प्रवृत्ति कहा जा सकता है। दैवी प्रवृत्ति वह आंतरिक यात्रा है जो परमात्मा की ओर ले जाती है जबकि आसुरी प्रवृत्ति हमें उनसे दूर ले जाती है। श्रीकृष्ण ने ‘ अभयं ’ (भय का अ भाव) को दैवी गुणों में प्रथम बताया है (16.1)। यद्यपि अभयं का अर्थ सामान्यतः निर्भयता के रूप में किया जाता है किंतु उसका भावार्थ इससे कहीं अधिक गहन है। भगवद्गीता को समझने के लिए हमें हमेशा तीसरे विकल्प को ध्यान में रखना चाहिए। जैसे कि राग और विराग से परे की तीसरी अवस्था वीत-राग है। इसी तरह आसक्ति और विरक्ति से परे की तीसरी अवस्था अनासक्ति है। हम आसक्ति/राग या विरक्ति/विराग के द्वन्द्वों से भली-भाँति परिचित हैं लेकिन तीसरी अवस्था तक पहुँचना एक चुनौती है। ऐसा ही ' अभय ' भी है जो भय और निर्भयता दोनों से परे है। जहाँ भय एक आंतरिक भावना की अभिव्यक्ति है वहीं निर्भयता...

215. खुला रहस्य

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  भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को ‘ पुरुषोत्तम योग ’ कहा जाता है। यह शीर्षक निम्नलिखित श्लोक से लिया गया है जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं “ मैं नाशवान् कार्य प्रकृति (सृष्टि) से परे हूँ और अविनाशी आत्मा (कूटस्थ) से भी उत्तम हूँ। इसलिए , वेदों और जगत् में मुझे पुरुषोत्तम कहा गया है ” ( 15.18) । एक बार जब जागरूकता स्थापित होने लगती है तो हमारे सामने दो मूलभूत प्रश्न आते हैं: हमें क्या करना चाहिए और हमें क्या जानना चाहिए ? श्रीकृष्ण ने पहले प्रश्न के उत्तर में हमारे सभी कर्मों को उनको अर्पण करके हमें ममत्व रहित और आशारहित रहने को कहा था (3.30)। श्रीकृष्ण दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं “ जो ज्ञानी पुरुष मुझे पुरुषोत्तम के रूप में जानते हैं , वास्तव में वे सब कुछ जानते हैं। वे पूर्ण रूप से मेरी पूजा करते हैं ” (15.19)। हालाँकि यह एक सरल और खुला रहस्य है कि जब जानना अस्तित्वगत स्तर पर होता है तब ‘ सब कुछ जानना ’ सम्भव होता है। श्रीकृष्ण ने हमें हर समय उनका स्मरण करने का निर्देश दिया था और अब वे हमें अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ उनकी आराधना करने के लिए कहते हैं। हर क्षण और अप...

214. कैसे और क्यों

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  परमात्मा अनन्त सागर के समान हैं और आत्मा एक अविनाशी बूंद है जो नाशवान् मानव शरीर में स्थित है। श्रीकृष्ण उस सागर का वर्णन करते हुए कहते हैं “ सूर्य में स्थित तेज जो सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और अग्नि में भी है , उसको तू मेरा ही तेज जान (15.12)। मैं पृथ्वी में व्याप्त होकर सभी जीवों को अपनी शक्ति से पोषित करता हूँ। चन्द्रमा के रूप में मैं सभी वनस्पतियों को जीवन रस से पोषित करता हूँ ” (15.13)। “ मैं वैश्वानर (तेज शक्ति) बनकर सभी प्राणियों के शरीर में स्थित हूँ , प्राण (श्वास) और अपान (प्रश्वास) से युक्त होकर चतुर्विध अन्न को पचाता हूँ (15.14)। मैं समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित ; और मुझसे ही स्मृति (आत्म-जागरूकता) , ज्ञान और अपोहन (संदेहों का समाधान) उत्पन्न होते हैं। मैं ही समस्त वेदों द्वारा जानने योग्य हूँ , मैं ही वेदान्त का रचयिता और वेदों के अर्थों को जानने वाला हूँ ” (15.15)। सबसे पहले , श्रीकृष्ण कहते हैं वे सूर्य का तेज हैं और सभी जीवों को ऊर्जा से पोषित करते हैं। पौधे इसे हमारे भोजन में बदल देते हैं। जीवाश्म ईंधन जैसे कोयला ...

213. आत्मा और परमात्मा

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  श्रीकृष्ण विभिन्न संदर्भों में ' सृष्टि ' की व्याख्या करते हैं और संकेत देते हैं कि सम्पूर्ण अस्तित्व प्रकृति और पुरुष का समन्वय है। उनका गर्भ महत्-ब्रह्म (महान् प्रकृति) है जिसमें वे बीज स्थापित करते हैं जो सभी प्राणियों के जन्म का कारण है ( 14.3) । गुण और विकार प्रकृति से उत्पन्न होते हैं ( 13.20) और प्रकृति ही कारण और प्रभाव के लिए भी उत्तरदायी है ; पुरुष सुख और दुःख के द्वन्द्वों का अनुभव करने के लिए उत्तरदायी है ( 13.21) । श्रीकृष्ण आगे विस्तार से बताते हैं और कहते हैं “ सृष्टि में दो प्रकार के पुरुष हैं , क्षर (नाशवान्) और अक्षर (अविनाशी)। नाशवान् वे सभी प्राणी हैं जो भौतिक जगत् में हैं। अविनाशी को कूटस्थ (आत्मा) कहते हैं ( 15.16) । लेकिन एक और शाश्वत सर्वोच्च सत्ता है जिसे परमात्मा कहते हैं। तीनों लोकों में व्याप्त होकर , वे उनका पालन करते हैं ” ( 15.17) । यह शाश्वत परमात्मा ही है जो अविनाशी आत्मा और नाशवान् भौतिक जगत् (प्रकृति) दोनों का पालन करता है। वर्तमान वैज्ञानिक समझ यह है कि आरंभ में केवल शुद्ध ऊर्जा ही थी। समय के साथ कुछ ऊर्जा पदार्थ में परिवर्तित हो गई। य...

212. पुनर्जन्म के नियम

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  श्रीकृष्ण ने जीवन की एक रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि उनका एक अंश देहधारी आत्मा के रूप में प्रकट होता है और इन्द्रियों को आकर्षित करता है जो प्रकृति का हिस्सा हैं। यह संकेत करता है कि इच्छाएँ ही इन्द्रियों को आकर्षित करती हैं। उदाहरण के लिए देखने या सुनने की इच्छा के कारण क्रमशः आँख या कान जैसी इन्द्रियों का विकास हुआ । वे आगे देहधारी आत्मा के शरीर त्यागने और नए शरीर में प्रवेश करने की प्रक्रिया के बारे में बताते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं “ जैसे वायु सुगंध को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है , वैसे ही देहधारी आत्मा मन और इन्द्रियों को (सूक्ष्म शरीर को) अपने साथ ले जाती है , जब वह एक पुराने शरीर को छोड़कर नए शरीर में प्रवेश करती है ( 15.8) । मोहग्रस्त लोग आत्मा को शरीर में निवास करते हुए , शरीर से प्रस्थान करते हुए या इन्द्रियों के द्वारा विषयों का अनुभव करते हुए नहीं देख सकते । केवल ज्ञानचक्षु वाले देख सकते हैं ( 15.10) । मुक्ति के लिए प्रयत्नशील योगी परमात्मा को अपने भीतर विद्यमान देखते हैं ; लेकिन अशुद्ध मन वाले अज्ञानीजन परमात्मा को अनुभव करने में असमर्थ होते हैं , भ...

211. जीवन की रूपरेखा

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  सृष्टि को परमात्मा की लीला या दिव्य नाटक कहा जाता है और यहाँ गंभीरता से लेने जैसा कुछ भी नहीं है। इस दिव्य नाटक में कुछ नियमों का पालन किया जाता है। श्रीकृष्ण इन नियमों की व्याख्या करते हुए कहते हैं “ इस भौतिक संसार की जीवात्माएँ मेरी शाश्वत आत्मा का केवल एक अणु अंश मात्र हैं और पाँच इन्द्रियों और मन को आकर्षित करती हैं , जो प्रकृति का एक हिस्सा हैं (15.7)। श्रवण , दृष्टि , स्पर्श , स्वाद , गंध की ग्राहिका इन्द्रियों तथा मन को अधिष्ठान बनाकर यह जीवात्मा इन्द्रिय विषयों का भोग करता है ” (15.9)। श्रीकृष्ण ने पहले प्रकृति और पुरुष को अनादि कहा था। गुण और विकार प्रकृति से पैदा होते हैं (13.20)। प्रकृति कारण और प्रभाव के लिए जिम्मेदार है ; पुरुष सुख और दुःख के द्वन्द्वों का अनुभव करने के लिए जिम्मेदार है (13.21)। साथ मिलकर ये श्लोक जीवन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। सबसे पहले , परमात्मा का एक अंश प्रत्येक प्राणी के भीतर विद्यमान है जिसे हम आत्मा कहते हैं और इस अर्थ में हम उससे कभी अलग नहीं होते। बस , इन्द्रिय जगत् का अनुभव करते हुए हम भूल जाते हैं कि हम वास्तव में कौन हैं। दूसर...