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5. ज्ञान, कर्म और भक्ति योग

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  गीता लोगों को उनके दृष्टिकोण के आधार पर भिन्न दिखाई देती है। गीता में तीन अलग - अलग मार्ग बताए गए हैं - कर्मयोग , सांख्ययोग और भक्तियोग। मनोकेन्द्रित व्यक्ति के लिए कर्मयोग आदर्श है। सांख्ययोग बुद्धि के लिए है और भक्तियोग हृदय के लिए है। आज की दुनिया में , अधिकतर व्यक्ति मनोकेन्द्रित की श्रेणी में आते हैं। यह इस विश्वास पर आधारित है कि हम जंजीरों से बंधे हुए हैं और खुद को मुक्त करने के उद्देश्य से उन्हें तोडऩे के लिए कड़ी मेहनत करने की जरूरत है। इसलिये यह कर्मकेन्द्रित है। उनके साथ कोई भी बातचीत ‘ अब मुझे क्या करना चाहिए ’ के साथ खत्म होगी। यह मार्ग हमें निष्काम कर्म यानी बिना प्रेरणा के कर्म की ओर ले जाता है। सांख्ययोग को ज्ञानयोग के रूप में भी जाना जाता है और यह जागरूकता या जानने के बारे में है। इसका प्रारंभिक बिंदु यह विश्वास है कि हम एक अंधेरे कमरे में हैं और अंधेरे को मिटाने के लिए अंधेरे में एक दीपक जलाना

4. दिमाग का खेल

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गीता हमें हमारी इंद्रियों के बारे में समझने पर जोर देती है क्योंकि वे हमारे आंतरिक और बाहरी दुनिया के बीच के द्वार हैं। तंत्रिका विज्ञान ( न्यूरो साइंस ) ने कहा है , न्यूरॉन्स जो एक साथ काम करते हैं , एक साथ जुडक़र श्रृंखला बनाते हैं जिसको हार्डवायरिंग कहते हैं। गीता के शब्द भी उस समय की भाषा का प्रयोग करते हुए ऐसा ही संदेश देते हैं। हमारे मस्तिष्क में लगभग 100 अरब   न्यूरॉन होते हैं। उनमें से कुछ डी . एन . ए . द्वारा शरीर के स्वचालित कार्यों की देखभाल के लिए जन्म से ही जुड़े होते हैं और कुछ हमारे जीवन काल के दौरान हमारे द्वारा जोड़े जाते हैं। उदहारण के लिये गाड़ी चलाना सीखने के पहले दिन हम सभी को गाड़ी चलाना मुश्किल लगा और फिर धीरे - धीरे इसकी आदत हो गई। यह हार्ड वायरिंग के कारण ही है जो मस्तिष्क अप्रयुक्त न्यूरॉन्स के साथ ड्राइविंग में शामिल सभी गतिविधियों को समन्वयित करने के लिए करता है। ऐसा ही सभी कौशल के साथ होता

3. यह यहाँ है और अभी है

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  गीता इस बारे में है कि हम क्या हैं। यह सत्य को जानने के अलावा सच्चा होने जैसा है और ऐसा तब होता है जब हम वर्तमान क्षण में रहते हैं। अर्जुन की अंतर्निहित दुविधा यह है कि अगर वह राज्य के लिए अपने मित्रों , रिश्तेदारों , बुजुर्गों और शिक्षकों का वध कर देता है तो दुनिया की नजर में उसकी छवि का क्या होगा। यह बहुत तर्कसंगत प्रतीत होता है। अगर किसी को गीता के अनुसार जीवन जीना है तो उसे इस पहली बाधा को पार करना होगा। अर्जुन की असली दुविधा उसके भविष्य को लेकर है , जबकि श्रीकृष्ण कहते हैं कि हमें कर्म करने का अधिकार है लेकिन कर्मफल पर कोई अधिकार नहीं है। क्योंकि कर्म वर्तमान में होता है और कर्मफल भविष्य में आता है। अर्जुन की तरह , हमारी प्रवृत्ति कर्मफल की प्राप्ति के लिए कार्य करती है। कभी - कभी आधुनिक जीवन हमें यह आभास दिलाता है कि भविष्य के परिणामों को नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन वास्तव में भविष्य इतनी सारी स

2. मंजिल एक रास्ते अनेक

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  जैसा कि कहा गया है , ‘ मंजिल एक , राहें अनेक ,’  गीता में दिए गए सभी मार्ग हमें अंतरात्मा की ओर ले जाते हैं। कुछ रास्ते एक दूसरे के विपरीत प्रतीत होते हैं। हालांकि , यह एक वृत्त की तरह है जहां दोनों तरफ की यात्रा हमें उसी मंजिल तक ले जाएगी। गीता विभिन्न स्तरों पर कार्य करती है। कभी श्रीकृष्ण अर्जुन के स्तर पर आते हैं और कभी वे परमात्मा के रूप में प्रकट होते हैं। यह समझने में कठिनाइयाँ पैदा करता है , खासकर प्रारंभिक अवस्था में , क्योंकि ये दोनों स्तर अलग - अलग प्रतीत होते हैं। पिछली शताब्दी की शुरुआत में , वैज्ञानिकों को प्रकाश को समझने में इसी तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। पहले यह सिद्ध हुआ कि प्रकाश एक तरंग है और बाद में यह ज्ञात हुआ कि यह एक कण की तरह भी व्यवहार करता है। दोनों सिद्धांत एक दूसरे के विरोधी प्रतीत होते हैं। लेकिन प्रकाश , जिसे हम हर पल देखते हैं , प्रत्यक्ष अंतर्विरोधों का एक संयोजन है। जीवन भी

1. अहंकार से आरम्भ

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  श्रीमद्भगवद्गीता कुरुक्षेत्र के युद्ध क्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण और योद्धा अर्जुन के बीच 700 श्लोकों का संवाद है। युद्ध शुरू होने से ठीक पहले , अर्जुन को यह महसूस होता है कि युद्ध में उसके कई परिजन और मित्र मारे जा सकते हैं और तर्क देता है कि यह कई दृष्टिकोण से बुरा है। अर्जुन की दुविधा उसकी धारणा से निकलती है कि ‘ मैं कर्ता हूँ ’ - अहंकर्ता जो कि अहंकार के रूप में भी जाना जाता है। यह अहंकार हमें बताता रहता है कि हम अलग हैं , लेकिन हकीकत कुछ और है। हालांकि गर्व को आमतौर पर अहंकार के अर्थ के रूप में माना जाता है , लेकिन गर्व को अहंकार की कई अभिव्यक्तियों में से एक के रूप में लिया जा सकता है। श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच पूरी बातचीत इसी अहम् भाव के बारे में है , चाहे वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हो और   श्रीकृष्ण अर्जुन को अनेक मार्ग और मानक की जानकारी देते हैं। यदि हम कुरुक्षेत्र युद्ध को एक रूपक के रूप में