223. बुराई का फल बुरा ही होता है
श्रीकृष्ण आसुरी प्रवृत्ति वालों का विस्तार से वर्णन करते हुए कहते हैं “ ऐसे अनेक प्रकार से भ्रमित मन वाले , मोह के जाल में उलझकर तथा विषय-भोगों में आसक्त होकर घोर नरक में गिरते हैं (16.16)। ऐसे अभिमानी और हठी लोग , संपत्ति के मद और अहंकार से मदमस्त होकर , शास्त्रों के विधि-विधानों का आदर न करते हुए पाखंडपूर्वक केवल नाम मात्र के लिए यज्ञ करते हैं (16.17)। अहंकार (मैं कर्ता हूँ) , बल , दम्भ , कामना और क्रोध से अंधे होकर , ये द्वेषी पुरुष अपने भीतर तथा अन्य सभी प्राणियों में निवास करने वाले मुझ अन्तर्यामी को तुच्छ समझते हैं (16.18)। इन द्वेष करनेवाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में डालता हूँ (16.19)। ये अज्ञानी आत्माएँ आसुरी योनियों में बार-बार जन्म लेती हैं। हे अर्जुन , वे मूढ़ मुझे प्राप्त न कर पाने पर , धीरे-धीरे आसुरी योनियों को और उससे भी अति अधम गति को ही प्राप्त होते हैं ” (16.20)। श्रीकृष्ण ने पहले कहा था कि वे सभी जीवों के प्रति समान भाव रखते हैं। उनके लिए न तो कोई द्वेष्य है और न ही कोई प्रिय है (9.29)। उपरोक्त श्लोक संकेत कर...