224. नरक के तीन द्वार
एक नैतिक शिक्षा की कक्षा में शिक्षक सत्य बोलने और बड़ों का आदर करने का पाठ पढ़ाते हैं। अगले दिन सभी छात्र उस पाठ को याद कर लेते हैं और कक्षा में दोहराते हैं किंतु एक छात्र कहता है कि वह पाठ याद नहीं कर पाया और शिक्षक उस छात्र पर क्रोधित हो जाते हैं क्योंकि वह पाठ सरल था। छात्र बताता है कि उसने पिछले दिन अपने भाई को बड़ों के क्रोध से बचाने के लिए झूठ बोला था। यह कहानी ‘ जानने ’ और ‘ होने ’ के बीच के अंतर को दर्शाती है। निम्नलिखित श्लोक ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं जिन्हें समझना तो बहुत सरल है परंतु जब हम इन्हें पढ़ते हैं तो इन्हें आत्मसात् करना कठिन होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं “ काम , क्रोध और लोभ जीवात्मा को आत्म विनाश के नरक की ओर ले जाने वाले तीन द्वार हैं। इसलिए मनुष्य को इन तीनों का त्याग करना चाहिए (16.21)। जो अंधकार रूपी इन तीनों द्वारों से मुक्त होते हैं , वे अपनी आत्मा के कल्याण के लिए चेष्टा करते हैं और इस प्रकार से परम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं ” (16.22)। किसी वस्तु या विषय को समझने के लिए उसके विपरीत को समझना भी आवश्यक है -जैसे दिन और रात। कई मौकों पर श्रीकृष्ण ने अ...