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121. नमस्ते की ताकत

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‘ नमस्ते’ या ‘नमस्कार’ का प्रयोग भारतीय सन्दर्भ में एक दूसरे का अभिवादन करने के लिए किया जाता है। इसका अर्थ है ‘आप में देवत्व को प्रणाम’। विभिन्न संस्कृतियों में प्रयुक्त अभिवादन ऐसा ही संदेश देते हैं और इसकी उत्पत्ति सभी प्राणियों में स्वयं को और स्वयं में ‘‘सभी प्राणियों को समान भाव से देखना है’’ ( 6.29) । जब इस तरह के अभिवादन का जागरूकता के साथ आदान-प्रदान किया जाता है , तो उनमें स्वयं के साथ-साथ दूसरों में भी देवत्व को महसूस करने की क्षमता होती है। ‘ एक ही तत्व को हर जगह देखना’ निराकार का मार्ग है , जिसे कठिन मार्ग माना जाता है। श्रीकृष्ण तुरंत इसे आसान बनाते हैं और कहते हैं कि मुझे हर जगह देखो और सभी को मुझ में देखो , जो साकार का मार्ग है ( 6.30) । ये दोनों श्लोक साकार या निराकार के माध्यम से परमात्मा को प्राप्त करने में मदद करते हैं और सभी आध्यात्मिक पथों की नींव इन दोनों में से एक में होती है। अव्यक्त असीम है जबकि व्यक्त विभाजनकारी है और सीमाओं से बंधा हुआ है। स्वयं में सब और सब में स्वयं की अनुभूति अव्यक्त के साथ एकता के अलावा और कुछ नहीं है। आधुनिक सन्दर्भ में , इसे सं

120. सभी में स्वयं और स्वयं में सभी को देखना

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अस्तित्व व्यक्त जैसे हमारा शरीर और अव्यक्त या आत्मा (स्व) का समन्वय है। हम अस्तित्व को या तो व्यक्त के माध्यम से या अव्यक्त के माध्यम से अनुभव कर सकते हैं। हम व्यक्त से परिचित हैं जहां हम लोगों , स्थितियों और चीजों के बीच अंतर करते हैं क्योंकि हमारी इंद्रियां केवल व्यक्त को ही समझने में सक्षम हैं। हम व्यक्त के पीछे छुपे हुए अव्यक्त को मुश्किल से पहचान पाते हैं क्योंकि इसके लिए इंद्रियों से परे जाने की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए , जब हम किसी व्यक्ति को देखते हैं तो हम सबसे पहले देखते हैं कि वह पुरुष है या महिला। इसके बाद हम देखते हैं कि उसका पोशाक और व्यवहार कैसा है , और वह कितना प्रभावशाली या धनी है। इसके बाद , हम उससे जुड़े अच्छी और बुरी बातों को याद करते हैं। हमारा व्यवहार उन निर्णयों पर निर्भर करता है जो हम इन विभाजनों के आधार पर करते हैं। इस संबंध में श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘‘सर्वव्यापी अनन्त चेतन में एकीभाव से स्थित रूप योग से युक्त आत्मा वाला तथा सबमें समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में स्थित और सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में देखता है’’ ( 6.29) । यह पां

119. जागरूकता और करुणा का मिलन

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  समत्व उन सभी ज्ञानीजन के उपदेशों का सार है जो कभी इस धरती पर आए थे। उनके शब्द , भाषा और तरीके अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन संदेश समत्व प्राप्त करने का है। इसके विपरीत कोई भी उपदेश या अभ्यास सही नहीं है। मन के सन्दर्भ में , यह एक ओर इंद्रियों और दूसरी ओर बुद्धि के बीच संतुलन है। यदि कोई इंद्रियों की ओर झुकता है , तो वह वासनाओं में पूरी तरह डूब जाता है। जब बुद्धि हावी हो जाती है , तो व्यक्ति जागरूकता प्राप्त करता है , लेकिन जब करुणा की कमी होती है , वह दूसरों को नीची नजर से देख सकता है। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि सर्वश्रेष्ठ योगी वह है जो दु:ख या सुख में दूसरों के लिए वैसा ही अनुभव करता है जैसा वह अपने लिए करता है ( 6.32) । यह जागरूकता और करुणा का सामंजस्य है। श्रीकृष्ण ने हमें सोने और चट्टान जैसी चीजों को एक समान मानने के लिए कहा ; एक गाय , एक हाथी और एक कुत्ता को भी एक समान मानने के लिए कहा। बाद में उन्होंने हमें मित्रों और शत्रुओं सहित सभी लोगों के साथ समान व्यवहार करने के लिए कहा। इसे समझने का एक और तरीका यह है कि लोगों के साथ व्यवहार करने के तीन अलग-अलग स्तर हैं। पहला कानून

118. परिवर्तन ही स्थायी है

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वस्तुओं की भौतिक या प्रकट दुनिया में परिवर्तन स्थायी है और अव्यक्त या आत्मा अपरिवर्तनीय रहती है। इन दोनों के बीच सामंजस्य लाने के लिए एक तंत्र की जरूरत होती है। रूपक के रूप में , यह एक स्थिर हब और घूमने वाले पहिये के बीच बॉल बेयरिंग तंत्र की तरह है या इंजन और पहियों से दो अलग-अलग गति को संभालने वाले गियरबॉक्स की तरह है। इसी तरह , यह इन्द्रियाँ , चित्त और बुद्धि का मिलाजुला एक तंत्र है जो अपरिवर्तनीय आत्मा और हमेशा बदलती हुई वस्तुओं की दुनिया के बीच है। श्रीकृष्ण ने एक पदानुक्रम दिया कि इंद्रियां इंद्रिय विषयों से श्रेष्ठ हैं , मन इंद्रियों से श्रेष्ठ है , और बुद्धि मन से श्रेष्ठ है। बुद्धि से भी श्रेष्ठ आत्मा है ( 3.42) । इंद्रियों का भौतिक भाग भौतिक संसार में होने वाले परिवर्तनों के प्रति स्वत: प्रतिक्रिया करता है। मन स्मृति के साथ-साथ इंद्रियों के नियंत्रक भाग का एक संयोजन है और हमें सुरक्षित रखने के लिए इंद्रियों के भौतिक भाग से इसमें लाए गए हर बाहरी परिवर्तन को संभालने की अपेक्षा की जाती है। मुख्य मुद्दा यह है कि क्या मन को बुद्धि नियंत्रित करती है या बाहरी संवेदनाएँ। यदि यह

117. संयम की कला

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  कई वजहों से मस्तिष्क एक अद्भुत अंग है। इसकी विशेषताओं में से एक यह है कि यह दर्द महसूस नहीं करता क्योंकि इसके ऊतक में दर्द संचरित करने वाले नोसिसेप्टर नहीं होते हैं। न्यूरोसर्जन इस विशेषता का उपयोग मरीज के जागते समय सर्जरी करने के लिए करते हैं। शारीरिक पीड़ा और सुख मस्तिष्क की तटस्थ अवस्था से तुलना का परिणाम हैं। ऐसी ही तटस्थ अवस्था मानसिक स्तर पर भी होती है जिससे तुलना की वजह से मानसिक पीड़ा और सुख का अनुभव होता है। यह पृष्ठभूमि हमें यह समझने में मदद करेगी जो श्रीकृष्ण कहते हैं कि , जब योग के अभ्यास से संयमित मन स्थिर हो जाता है और जिसमें वह स्वयं को स्वयं में देखता है तब वह आत्मसंतुष्ट होता है ( 6.20) । मूल बात स्थिर होना है। यह सदा डगमगाते या अस्थिर मन को स्थिर करना है। इसे प्राप्त करने के लिए , श्रीकृष्ण संयम का सुझाव देते हैं। संयम का अर्थ भावनाओं का दमन या उनकी अभिव्यक्ति नहीं है। यह उन्हें जागरूकता के माध्यम से साक्षी बनकर देखना है जिसे हम बीती हुई स्थितियों का विश्लेषण करके आसानी से पा सकते हैं। अंत में , यह स्वयं को हर जगह स्वयं के रूप में देखना है। एक बार जब हम

116. अध्यात्म का सहज मार्ग

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आध्यात्मिक पथ के बारे में आम धारणा यह है कि इसका अनुसरण करना कठिन है। श्रीकृष्ण ने पहले ऐसे लोगों को आश्वासन दिया था कि छोटे प्रयास कर्म योग में बड़ा लाभ पहुंचाते हैं ( 2.40) । वे इसे और सरल बनाकर समझाते हैं जब वे कहते हैं , ‘‘ दु:खों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार , कर्मों में यथायोग्य चेष्टा और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है’’ ( 6.17) । योग या आध्यात्मिक मार्ग उतना ही सरल है जितना भूख लगने पर भोजन करना ; समय पर काम करना ; समय पर सोना और थक जाने पर आराम करना। इसके अलावा बाकी सब सिर्फ बातें हैं जो हम खुद को और दूसरों को बताते हैं। एक बच्चे को एक बूढ़े व्यक्ति की तुलना में अधिक नींद की जरूरत होती है। भोजन के संबंध में हमारी आवश्यकताएं दिन की शारीरिक गतिविधियों के आधार पर भिन्न हो सकती हैं , यह दर्शाता है कि ‘यथायोग्य’ का अर्थ वर्तमान क्षण में जागरूक होना है। इसे पहले करने योग्य कर्म ( 6.1) या नियत कर्म ( 3.8) के रूप में संदर्भित किया गया था। हमारा दिमाग अपनी कल्पना से साधारण तथ्यों को बढ़ाचढ़ाकर इनके इर्द-गिर्द पेचीदा कहानियों को बुनता है। ये कहानि

115. ध्यान की एक विधि

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  श्रीकृष्ण कहते हैं कि आप या तो अपने मित्र हैं या अपने शत्रु ( 6.6) । अपना मित्र बनने के लिए उन्होंने सुख-दु:ख की भावनाओं के प्रति ( 6.7), सोने-पत्थर जैसी चीजों के प्रति ( 6.8) और मित्र-शत्रु जैसे लोगों के प्रति ( 6.9), इंद्रियों को नियंत्रित करके समत्व बनाए रखने का मार्ग बताया ( 6.8) । इसके साथ-साथ श्रीकृष्ण ध्यान का मार्ग भी सुझाते हैं ( 6.10-6.15) । श्रीकृष्ण कहते हैं भौतिक संपत्ति से रहित एकांत में रहकर ( 6.10), एक साफ-सुथरी जगह पर बैठकर जो ज्यादा नीचे या ऊँचा न हो ( 6.11), नियंत्रित मन के साथ , पीठ और गर्दन को सीधा करके , चारों ओर देखे बिना ( 6.12-6.13), शान्त , निर्भय और एकाग्र रहकर ( 6.14) और निरंतर स्वयं से एकाकार होने का प्रयास करने से परम शांति प्राप्त होती है ( 6.15) । संवेदी उत्तेजनाओं के हमले के दौरान समत्व प्राप्त करना कठिन हो जाता है। इसलिए एकांत में रहने से अस्थायी राहत मिलती है। इसका गहरा अर्थ यह है कि भले ही हम शारीरिक रूप से खुद को एकांत में रखते हैं पर मानसिक रूप से अपने व्यवसायों , परिस्थितियों और लोगों को अपने साथ ध्यान में ले जाने की सम्भाव