Posts

Showing posts from October, 2024

151. राजा बाली की कहानी

Image
  रामायण की कथा के अनुसार , राजा बाली अजेय था क्योंकि उसमें किसी भी मुकाबले में अपने दुश्मन की आधी ताकत छीन लेने की क्षमता थी। यहाँ तक कि भगवान् राम को भी उसे पेड़ के पीछे छुपकर मारना पड़ा। यह दर्शाता है कि बाली एक अनूठा शिक्षार्थी था जो लोगों और परिस्थितियों से कौशल और ज्ञान प्राप्त करता था क्योंकि वह दूसरों में शत्रुता के बजाय परमात्मा को देखता था। जब भी हम शत्रुता करते हैं तो घृणा पैदा होती है जो परमात्मा को देखने की क्षमता को हर लेती है। श्रीकृष्ण ने पहले कहा था कि सारा संसार उन्हीं से व्याप्त है (9.4) जो इंगित करता है कि प्रत्येक व्यक्ति या स्थिति परमात्मा का ही एक रूप है। इस मूल तथ्य के बारे में हमारी अज्ञानता के कारण हम ' बाली ' की तरह सीख नहीं पाते। इस संबंध में श्रीकृष्ण कहते हैं “ अज्ञानी , सभी प्राणियों के निर्माता के रूप में मेरी पारलौकिक प्रकृति से अनजान , मानव रूप में मेरी उपस्थिति को भी नकारते हैं ” (9.11)। यह केवल कर्मकांड करने या प्रभु की स्तुति के बारे में नहीं है बल्कि इस गहन अनुभूति की बात है कि वे हमारे आस-पास के हर व्यक्ति में व्याप्त हैं , चाहे हम उ...

150. कुंजी अनासक्ति है

Image
  विज्ञान के अनुसार क्वांटम क्षेत्र (quantum field) एक अदृश्य ऊर्जा क्षेत्र है जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। ऐसा ही एक क्षेत्र ‘हिग्स क्षेत्र’ कहलाता है और इस क्षेत्र के साथ होने वाली परस्पर क्रिया ही उप-परमाणविक (subatomic) कणों को द्रव्यमान प्रदान करती है। इन उप-परमाणविक कणों का संयोजन ही हमारे चारों ओर दिखने वाले पदार्थ हैं। जबकि उप-परमाणविक कणों को वजन पाने के लिए ‘हिग्स क्षेत्र’ की आवश्यकता होती है , ‘ हिग्स क्षेत्र’ को अपने अस्तित्व के लिए किसी की आवश्यकता नहीं होती है। उपरोक्त वैज्ञानिक प्रतिमान हमें समझने में मदद करेगा जब श्रीकृष्ण कहते हैं “ मेरे अव्यक्त रूप से सारा जगत् व्याप्त है , सभी प्राणी मुझमें स्थित हैं किन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ (9.4)। वे सब प्राणी मुझमें स्थित नहीं हैं ; किन्तु मेरे दिव्य योगशक्ति को देखो! मैं प्राणियों को जन्म देता हूँ और उनका धारण-पोषण करता हूँ किन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ ” (9.5)। अर्जुन को समझाने के लिए श्रीकृष्ण एक उदाहरण देते हुए कहते हैं “ जैसे सर्वत्र विचरने वाला वायु सदा आकाश में ही स्थित है , वैसे ही यह जान लो क...

149. दोषदृष्टि रहित होना

Image
  श्रीकृष्ण कहते हैं “ तुझ दोषदृष्टि रहित भक्त के लिए इस परम गोपनीय विज्ञानसहित ज्ञान को पुनः भलीभांति कहूँगा जिसको जानकर तुम दुःखरूप संसार से मुक्त हो जाओगे (9.1)। यह विज्ञानसहित ज्ञान सब विद्याओं का राजा , सब गोपनीयों का राजा , अति पवित्र , अति उत्तम , प्रत्यक्ष फलवाला , धर्मयुक्त , साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है (9.2)। इस उपर्युक्त धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझको न प्राप्त होकर संसारचक्र में भ्रमण करते रहते हैं ” (9.3)। श्रीकृष्ण ने इस राजसी ज्ञान को प्राप्त करने के योग्य होने के लिए दो शर्तें रखीं। श्रद्धावान् होना पहली शर्त है क्योंकि श्रद्धा के अभाव में राजसी ज्ञान भी कोरे शब्द मात्र बनकर रह जाता है। द्वेष से मुक्त होना दूसरी शर्त है जिसका मतलब है दोष ढूंढने से बचना। जब दो लोग एक ही चीज या स्थिति को दो अलग-अलग तरीकों से देखते हैं तो मतभेद होना स्वाभाविक है जिसके कारण हम अपने चारों ओर कड़वाहट देखते हैं। समकालीन संदर्भ में इसे ' हम दुनिया को वैसे ही देखते हैं जैसे हम हैं लेकिन वैसी नहीं जैसी वह है ' के रूप में वर्णित किया जाता है। जब दोषदृष्टि खत्म हो जाती है त...

148. ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग

Image
  एक बार दो शत्रुओं ने प्रार्थना की और प्रभु उनके सामने प्रकट हुए। प्रभु ने दोनों को वरदान देना चाहा। पहले व्यक्ति ने दूसरे की इच्छाओं के बारे में जानना चाहा। परन्तु दूसरे व्यक्ति ने प्रभु से अनुरोध किया कि पहले वाले को पहले आशीर्वाद दें क्योंकि प्रभु वहाँ पहले प्रकट हुए थे। तब पहले व्यक्ति ने प्रभु से कहा कि दूसरे की अपेक्षा से उसे दोगुना दे दें। दूसरा व्यक्ति जो शत्रुता से अंधा हो गया था , प्रार्थना किया कि वह एक आँख खो दे ताकि पहला व्यक्ति दोनों आँखें खो देगा ; वह एक पैर खो दे ताकि पहला दोनों पैर खो देगा। परस्पर हानि का यह सिलसिला चलता रहा। हार-हार का यह खेल तब चलता है जब कोई अपनी ऊर्जा घृणा में लगाता है। इसीलिए श्रीकृष्ण हमें द्वेष का त्याग करने की सलाह देते हैं , कर्म का नहीं (5.3)। इसके लिए वे क्षमा जैसे दैवी गुण (16.3) को विकसित करने का उपदेश देते हैं। इस कहानी से एक और सीख यह मिलती है कि हमें बुद्धिमानी से अपने समय और ऊर्जा का निवेश करना चाहिए क्योंकि ये हमारे स्तर पर सीमित हैं। इस संबंध में श्रीकृष्ण कहते हैं दो शाश्वत मार्ग हैं जिनमें पहला बिना वापसी का ज्योतिर्मय ...