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38. दोहराव महारत की कुंजी है

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    हम अपने जीवन में बहुत कुछ सीखते हैं , ज्ञान और अनुभव अर्जित करते हैं। लेकिन महत्वपूर्ण निर्णायक क्षणों में हम जागरूकता के आधार पर नहीं बल्कि अपनी प्रवृत्तियों के अनुसार व्यवहार करते हैं क्योंकि हमारी जागरूकता की गहराई आवश्यक स्तर से कम होती है। श्रीकृष्ण इसे भलीभांति जानते हैं और गीता में बार-बार विभिन्न दृष्टिकोणों से वास्तविकता के बारे में समझाते हैं ताकि यह जागरूकता और गहरी हो और आवश्यक स्तर को पार कर सके। गीता इस बात पर बल देती है कि हमारा एक शाश्वत आंतरिक स्वरूप है और एक बाह्य प्रकट स्वरूप है। हम स्वभावतः अपने बाह्य स्वरूप के साथ अपनी पहचान बनाने के अभ्यस्त होते हैं जिसमें भौतिक शरीर , हमारी भावनाएँ , विचार तथा हमारे चारों ओर की दुनिया सम्मिलित होती है। श्रीकृष्ण हमें सत्य को जानकर अपने उस आंतरिक स्वरूप से पहचान स्थापित करने का उपदेश देते हैं जो समस्त जीवों में व्याप्त है , शाश्वत है और अपरिवर्तनीय है। इन जटिलताओं को समझने के लिए बहती हुई नदी उचित उदाहरण है। इसके दो तट होते हैं और दोनों नदी के तल में मिल जाते हैं। जहाँ दोनों तट नदी के सहज प्रवाह के लिए आवश्यक है...