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41. ‘तटस्थ’ रहना

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  हमारा जीवन अपने कार्यों और निर्णयों के साथ-साथ दूसरों के कार्यों को भी ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ के रूप में विभाजित करने का अभ्यस्त है। श्रीकृष्ण कहते हैं समबुद्धि युक्त पुरुष अच्छे और बुरे दोनों कर्मों का त्याग कर देता है (2.50)। इसका अर्थ है कि जब हम समत्व योग अर्थात् मध्य में स्थित होने की अवस्था को प्राप्त करते हैं तब विभाजन/वर्गीकरण समाप्त हो जाते हैं। तब हम वस्तुओं को अपने निजी निर्णयों के बिना जैसे वे हैं वैसे ही देख पाते हैं। नैतिक उपदेश हमें बुरे कर्मों से बचने और अच्छे कर्मों को अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं जो आध्यात्मिक यात्रा के प्रारम्भिक चरणों में निस्संदेह सहायक होता है। किन्तु श्रीकृष्ण संकेत करते हैं कि समबुद्धि युक्त पुरुष अच्छे और बुरे दोनों कर्मों का त्याग कर देता है। अच्छे कर्म भी सूक्ष्म रूप से अहंकार को बढ़ाते हैं क्योंकि व्यक्ति स्वयं को बुरे कर्म करने वालों से श्रेष्ठ समझने लगता है। आध्यात्मिक पथ के आगे के चरणों में यह श्रेष्ठता का बोध बहुत बड़ी बाधा बन सकता है। अतः वास्तविक ध्यान उस विभाजक मन को समझने और उससे ऊपर उठने पर होना चाहिए जो निरन्तर कर्मों को अ...