91. स्व-अध्ययन
‘ मन में आग’ होने का अर्थ है भौतिक दुनिया में अपनी इच्छाओं , रुचियों और कर्तव्यों का पालन करने के लिए ऊर्जा और उत्साह से भरा होना। जब ऐसी ऊर्जा का उपयोग आत्म-साक्षात्कार के लिए किया जाता है तो इसे योग-अग्नि कहा जाता है। इस सन्दर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं “ दूसरे योगीजन इन्द्रियों की सम्पूर्ण क्रियाओं को और प्राणों की समस्त क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्मसंयम योगरूप अग्नि में हवन किया करते हैं ” ( 4.27) । दैनिक जीवन में हम परमात्मा को सुंदर फूल और स्वादिष्ट भोजन जैसी इन्द्रिय वस्तुएँ चढ़ाते हैं। यह श्लोक हमें इससे परे ले जाता है और कहता है कि स्वाद , सौंदर्य या गंध जैसी इन्द्रिय गतिविधियों को त्याग देना यज्ञ है न कि केवल इन्द्रिय वस्तु। इन्द्रियाँ विषयों के प्रति आसक्ति के द्वारा हमें बाह्य जगत् से जोड़ती रहती हैं और जब इन इन्द्रियों के विषयों का त्याग किया जाता है तो विभाजन समाप्त हो जाता है व एकता प्राप्त हो जाती है। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “ कई पुरुष द्रव्य संबन्धी यज्ञ करने वाले हैं , कितने ही तपस्या रूप यज्ञ करने वाले हैं , तथा दूसरे कितने ही योगरूप यज्ञ करने...