64. हमेशा अपना सर्वोत्तम करें
श्रीकृष्ण कहते हैं “ तू नियत कर्तव्य कर्म कर ; क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी नहीं होगा ” ( 3.8) । मानव शरीर के अस्तित्व के लिए भोजन का संग्रह और उपभोग जैसी क्रियाएँ आवश्यक हैं। इसके अलावा मानव शरीर में कई अंग , प्रणालियाँ और रसायन होते हैं जो नियमित रूप से हजारों आंतरिक क्रियाएँ करते हैं। यहाँ तक कि अगर उनमें से कुछ एक छूट जाएँ तो सम्बद्धता खो जाएगी और शरीर पीड़ित होगा या नष्ट हो जाएगा। उस अर्थ में निष्क्रियता से शरीर का रखरखाव संभव नहीं होगा। श्रीकृष्ण नियत कर्मों को करने की बात करते हैं जो एक जटिल अवधारणा है। पवित्र ग्रंथों में दिए गए अनुष्ठानों और समाज द्वारा हम पर थोपे गए कर्तव्य को आमतौर पर नियत कार्यों के रूप में लिया जाता है। लेकिन यह दोनों ही श्रीकृष्ण के सन्देश को परिभाषित करने से चूक जाते हैं। उदाहरण के लिए बीजावरण का नियत कर्म बीज की रक्षा करना है और उचित समय आने पर उसे स्वयं का क्षय करके अंकुर के लिए मार्ग प्रशस्त करना है। इससे स्पष्ट होता है कि नियत कर्म का स्वरूप समय के साथ बदलता रहता है।...