Posts

Showing posts from December, 2024

159. ज्ञान का प्रकाशमान दीपक

Image
  श्रीकृष्ण कहते हैं “ मेरे भक्त अपने मन को मुझमें स्थिर कर अपना जीवन मुझे समर्पित करते हुए सदैव संतुष्ट रहते हैं। वे एक दूसरे को ज्ञान प्रदान करते हुए मेरे विषय में वार्तालाप करते हुए और मेरी महिमा का गान करते हुए अत्यन्त आनन्द और संतोष की अनुभूति करते हैं ” (10.9)। यह प्रभु का आश्वासन है कि उनके भक्त संतुष्ट और आनंदित रहते हैं। श्रीकृष्ण का ‘ मैं ’ उन सभी संभावनाओं को समाहित करता है जिनके बारे में हम कभी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं जबकि हमारे ‘ मैं ’ में विभाजन है क्योंकि हम इस बात में भेद करते हैं कि क्या हमारा है ? और क्या नहीं। उनके भक्त वे हैं जिनके लिए विभाजन समाप्त होकर एकता प्राप्त हो गई। ऐसे भक्त जब भी बातचीत करते हैं और जो भी बोलते हैं , वह निश्चित रूप से भगवान् के बारे में ही होता है क्योंकि वे हर जगह उन्हीं को देखते हैं। इसके विपरीत , अभक्त लोग चीजों , लोगों और स्थितियों को अच्छा या बुरा के रूप में विभाजित करते हैं। इन विभाजनों की वजह से उनमें राग-द्वेष पैदा होता है। इस सन्दर्भ में श्रीकृष्ण ने ‘ योग: कर्मसु कौशलम् ’ का उल्लेख किया है (2.50)। यह दर्शाता है कि समभा...

158. सृष्टि का मूल

Image
  परमात्मा की अनेक विभूतियों में वर्षा एक है। बुद्धिमान् व्यक्ति अपने कटोरे को सीधा रखकर इस वर्षा रूपी आशीर्वाद को प्राप्त करते हैं। इसके अलावा , बुद्धिमान् व्यक्ति किसी भी विभूति जैसे वर्षा को देखते हैं तो परमात्मा को महसूस करते हैं और श्रीकृष्ण इसे ‘ उनके साथ एक होना ’ कहते हैं। इन झलकियों में बुद्धि , ज्ञान , विचारों में स्पष्टता , क्षमा , सत्यता , इन्द्रियों और मन पर नियंत्रण , सुख और दुःख , जन्म और मृत्यु , भय और साहस , अहिंसा , समता , संतोष , तप , दान , यश और अपयश शामिल हैं (10.4 और 10.5)। संयोगवश , नेतृत्व और प्रबंधन से संबंधित समकालीन साहित्य इन्हीं झलकियों के आसपास केंद्रित है। इसका मतलब है सकारात्मक रूप से अच्छे-बुरे और पसंद-नापसंद हालातों में प्रभु को अनुभव करना है। श्रीकृष्ण कहते हैं “ जो मेरी विभूति और योगशक्ति को तत्त्व से जानते हैं , वे लोग अविचल भक्तियोग के माध्यम से मुझमें एकीकृत हो जाते हैं , इसमें कोई संदेह नहीं है ” (10.7)। श्रीकृष्ण ‘ तत्त्व ’ शब्द को अस्तित्वगत स्तर पर सत्य को ‘ जानने ’ के लिए उपयोग करते हैं , केवल उसे कंठस्थ कर लेने के लिए नहीं। इस अनुभूति ...

157. पापों से मुक्ति

Image
  श्रीकृष्ण कहते हैं “ अपने कल्याण के लिए मेरे परम वचन को फिर से सुनो (10.1)। न तो देवता और न ही महर्षि मेरी उत्पत्ति को जानते हैं क्योंकि मैं ही उन सभी की उत्पत्ति का स्रोत हूँ ” (10.2)। अपने मूल को जानना स्वाभाविक रूप से कठिन होता है। एक पेड़ उस बीज को कभी नहीं जान सकता जिसने उसे जन्म दिया ; एक आंख स्वयं को नहीं देख सकती। इस प्रकार की सीमा हमारी उत्पत्ति को समझने की हमारी क्षमता को क्षीण करती है और हमारी इन्द्रियों की यही सीमा परमात्मा की उत्पत्ति के लिए भी लागू होती है। ऐसी सीमाओं को पार करने के लिए एक सरल उपाय यह है कि आंख को एक दर्पण दिखाया जाए ताकि वह स्वयं को देख सके। श्रीकृष्ण ऐसे कई उदाहरण इस अध्याय में प्रस्तुत करते हैं जो उनकी झलक दिखलाने वाले दर्पण की तरह काम कर सकते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं “ जो कोई मुझे अजन्मा , अनादि और समस्त लोकों के महान् ईश्वर के रूप में जानता है , केवल वही मोह रहित और समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं ” (10.3)। श्रीकृष्ण अस्तित्वगत स्तर पर जानने की बात कर रहे हैं न कि शब्दों को केवल रट लेने के बारे में। इसके लिए अपने अहंकार को त्याग कर अस्तित...

156. परमात्मा निष्पक्ष हैं

Image
  श्रीकृष्ण कहते हैं “ मैं सभी जीवों के प्रति समभाव रखता हूँ। मेरे लिए कोई भी द्वेष्य नहीं है और न ही प्रिय है। लेकिन जो प्रेम से मेरी भक्ति करते हैं , वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें हूँ ” (9.29)। हम देखते हैं कि कुछ लोग स्वास्थ्य , धन , शक्ति और प्रसिद्धि के मामले में भाग्यशाली होते हैं जबकि कुछ नहीं होते। इससे प्रभु के पक्षपात करने का भ्रम होता है। परमात्मा की कृपा व प्रेम बिना किसी शर्त के होती है। यद्यपि हमारे लिए प्रेम तब प्रवाहित होता है जब कुछ शर्तें पूरी होती हैं। इन कारणों से इस श्लोक को समझना कठिन हो जाता है। इस श्लोक की जटिलताओं को समझने के लिए वर्षा सबसे अच्छा उदाहरण है। बारिश के समय यदि हम कटोरा रखते हैं तो उसमें पानी इकट्ठा हो जाता है। कटोरा जितना बड़ा होगा उतना ही अधिक पानी उसमें भरा जा सकता है। लेकिन यदि उसे उल्टा रख दिया जाए तो उसमें पानी इकट्ठा करना असंभव हो जाता है। यदि हम वर्षा को परमात्मा के आशीर्वाद के रूप में लेते हैं तो यह आशीर्वाद निष्पक्ष रूप से सभी के लिए उपलब्ध है। आशीर्वाद इकट्ठा करने के लिए कटोरे को सीधा रखना ही भक्ति है। परमात्मा की कृपा समभाव...

155. परमात्मा को अहंकार का समर्पण

Image
  श्रीकृष्ण कहते हैं “ तुम जो कुछ भी करते हो , जो कुछ भी खाते हो वह मुझे अर्पण करके करो ” (9.27)। इन्द्रियों और इन्द्रिय वस्तुओं के परस्पर प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न दुःख और सुख के द्वन्द्वों के बारे में हमें जागरूक होना चाहिए (2.14)। श्रीकृष्ण इन सुखों और दुःखों को सहन करने की सलाह देते हैं क्योंकि ये अनित्य हैं। यह सांख्ययोग का दृष्टिकोण है। खाने का उदाहरण देते हुए श्रीकृष्ण सुख-दुःख के द्वन्द्वों को उनको समर्पित करने के लिए कहते हैं। यह भक्तियोग का दृष्टिकोण है। ये दोनों मार्ग द्वन्द्वों को पार करके द्वंद्वातीत बनने में मदद करते हैं। हमारे अन्दर का रंजिश और द्वेष हमारे दुःख का मुख्य कारण है। यह तब विकसित होता है जब लोग अपने शब्दों और कार्यों से हमें दुःख पहुँचाते हैं या जब दूसरे हमारी मदद या उपकार का आभार नहीं मानते। घृणा का मूल कारण हमारी यह धारणा है कि हमारे साथ-साथ दूसरे लोग भी कर्ता हैं जिससे अहंकार पैदा होता है। वास्तव में हमारे गुण सभी कार्यों के असली कर्ता हैं। अपने को और दूसरों को कर्ता मानने से रंजिश और द्वेष का कर्मबंधन पैदा होता है और हम जीवन भर के लिए ‘ दूसरों ’ स...