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Showing posts from August, 2025

186. जियो और जीने दो

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  श्रीकृष्ण कहते हैं “ जो भक्त संसार को उद्विग्न नहीं करता और स्वयं भी संसार से उद्विग्न नहीं होता ; जो हर्ष , ईर्ष्या , भय और उद्वेग से मुक्त है ; मेरे ऐसे भक्त मुझे प्रिय हैं। वे जो आकांक्षा से रहित है , बाह्य और आंतरिक रूप से शुद्ध , दक्ष , संसार के प्रति उदासीन हैं और सभी कर्मों में स्वार्थ रहित रहते हैं , ऐसे भक्त मुझे प्रिय हैं” (12.15 और 12.16)। ‘न स्वयं उद्विग्न होना और न दूसरों को उद्विग्न करना’ जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धि है। श्रीकृष्ण ने पहले ही इस प्रश्न का उत्तर दिया है कि हम विचलित क्यों हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि जब इन्द्रियाँ इन्द्रिय विषयों से मिलती हैं जैसे कि जब कान हमारी प्रशंसा या आलोचना सुनते हैं तो हमारे अन्दर सुख और दुःख के द्वंद्व उत्पन्न होते हैं। उन्होंने हमें सलाह दी कि हम उन द्वन्द्वों को सहन करना सीखें क्योंकि वे अनित्य हैं (2.14)। ये द्वंद्व और कुछ नहीं बल्कि वे उद्वेग हैं जिन्हें हम महसूस करते हैं। हमारे दैनिक जीवन में उद्वेग ‘जिम्मेदारी एक-दूसरे पर टालने’ (passing the buck) के खेल की तरह चलती रहती है। उदाहरण के लिए हम कार्यस्थल पर किसी उच्च अधि...

185. अति प्रिय भक्त

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  श्रीकृष्ण कहते हैं “ जो पुरुष सब भूतों में द्वेषभाव से रहित , स्वार्थरहित , सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममता से रहित , अहंकार से रहित , सुख-दुखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान् है ; तथा जो योगी  निरन्तर संतुष्ट है , मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किए हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चय वाला है -वह मुझमें अर्पण किए हुए मनबुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है” (12.13 - 12.14)। यह श्रीकृष्ण के पहले के आश्वासन के विपरीत प्रतीत होता है जहाँ उन्होंने कहा कि उनके लिए कोई भी द्वेष्य नहीं है और न ही कोई प्रिय है (9.29)। जबकि उनका आशीर्वाद वर्षा की तरह सभी के लिए उपलब्ध है , इन गुणों को प्राप्त करना अपने कटोरे को सीधा रखने जैसा है। ‘ किसी से द्वेष नहीं करना ’ भगवद्गीता का मूल उपदेश है। पहले श्रीकृष्ण ने द्वेष को त्यागकर कर्म करने की सलाह दी थी (5.3)। जब द्वेष हमारा एक हिस्सा बन जाता है तो इसे छोड़ना दुःखदायक हो जाता है क्योंकि यह हमारे एक अंग को खोने जैसा है। यह एक हानिकारक कैंसरयुक्त ट्यूमर (tumour) को हटाने जैसा है जिसे हटाते समय भी हमें दर्द होता है। दूसरी ओर , द्वेष को छोड़न...

184. त्याग से शांति

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  यदि कोई व्यक्ति मन को उनपर केंद्रित करने में असमर्थ है तो ऐसे लोगों के लिए श्रीकृष्ण ने अभ्यास योग की सलाह दी थी। वे आगे कहते हैं “ यदि तुम अभ्यास करने में असमर्थ हो , तो मेरा ध्यान करते हुए कर्म करने में तत्पर रहो। यहाँ तक कि मेरे लिए कर्म में संलग्न होकर भी , तुम्हें सिद्धि की प्राप्ति होगी। यदि तुम यह भी करने में असमर्थ हो , तो अपने आश्रय के रूप में मुझमें संलग्न रहते हुए , सभी कर्मों के फलों को त्यागकर स्वयं में केंद्रित हो जाओ अर्थात् आत्मवान् बनो ” (12.10 और 12.11)। प्रत्येक कर्म का एक कर्ता और कर्मफल होता है। कर्ता के भाव का त्याग करना एक मार्ग है जिसे श्रीकृष्ण ने ‘ मेरा ध्यान करते हुए कर्म करना ’ कहा है। इसका अर्थ है कर्तापन के भाव को परमात्मा को समर्पित करना है। दूसरा मार्ग कर्म के फल का त्याग करना है। श्रीकृष्ण आश्वस्त करते हैं कि अपने स्वकर्म के प्रति निष्ठा सिद्धि (सम्पूर्णता या मुक्ति) की ओर ले जाती है ( 18.45) । श्रीकृष्ण कहते हैं “ वास्तव में अभ्यास से श्रेष्ठ ज्ञान है , ज्ञान से श्रेष्ठ ध्यान है और ध्यान से श्रेष्ठ कर्मों के फल का परित्याग है और ऐसे त्याग ...