184. त्याग से शांति
यदि
कोई व्यक्ति मन को उनपर केंद्रित करने में असमर्थ है तो ऐसे लोगों के लिए
श्रीकृष्ण ने अभ्यास योग की सलाह दी थी। वे आगे कहते हैं “यदि तुम अभ्यास करने में असमर्थ हो, तो
मेरा ध्यान करते हुए कर्म करने में तत्पर रहो। यहाँ तक कि मेरे लिए कर्म में
संलग्न होकर भी,
तुम्हें सिद्धि की प्राप्ति होगी। यदि तुम यह भी करने में
असमर्थ हो,
तो अपने आश्रय के रूप में मुझमें संलग्न रहते हुए, सभी कर्मों के फलों को त्यागकर स्वयं में केंद्रित हो जाओ अर्थात् आत्मवान्
बनो” (12.10 और 12.11)।
प्रत्येक
कर्म का एक कर्ता और कर्मफल होता है। कर्ता के भाव का त्याग करना एक मार्ग है जिसे
श्रीकृष्ण ने ‘मेरा ध्यान करते हुए कर्म करना’ कहा है। इसका अर्थ है कर्तापन
के भाव को परमात्मा को समर्पित करना है। दूसरा मार्ग कर्म के फल का त्याग करना है।
श्रीकृष्ण आश्वस्त करते हैं कि अपने स्वकर्म के प्रति निष्ठा सिद्धि (सम्पूर्णता
या मुक्ति) की ओर ले जाती है (18.45)।
श्रीकृष्ण
कहते हैं
“वास्तव में अभ्यास से श्रेष्ठ ज्ञान है, ज्ञान से श्रेष्ठ ध्यान है और ध्यान से श्रेष्ठ कर्मों के फल का परित्याग है
और ऐसे त्याग से शीघ्र मन को शांति प्राप्त होती है” (12.12)।
हमारे
अनुभवों के माध्यम से प्राप्त जागरूकता ही ज्ञान है। प्रबुद्ध लोगों के उपदेशों के
माध्यम से भी ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। ज्ञान के लिए स्वयं को बदलने की
आवश्यकता है जो आसान नहीं है। जिन्हें खुद को बदलना मुश्किल लगता है उन लोगों के
लिए ध्यान एक आसान तरीका है।
कर्म
के फल को त्यागकर कर्म करना (2.47) भगवद्गीता का मूल उपदेश है। सबसे पहला प्रश्न
यह उठता है कि इस राह पर अपनी प्रगति को हम कैसे मापें। श्रीकृष्ण ने आश्वासन के
साथ एक तरीका सुझाया कि कर्मों के फल का त्याग करने से मन की शांति तुरंत मिलती
है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हम कितने सफल या असफल हैं या हमारी बाहरी परिस्थितियाँ
कितनी अच्छी या बुरी हैं। आध्यात्मिक यात्रा में हमारी प्रगति को मापने के लिए ‘मानसिक शांति’ की मात्रा एक मापदण्ड होती है।

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