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Showing posts from December, 2023

111. स्वयं से मित्रता

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श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं “ मनुष्य अपना उद्धार स्वयं करे और अपने को अधोगति में न डाले , क्योंकि यह मनुष्य आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है ” ( 6.5) । मित्रता की तरह इस अस्तित्वपरक श्लोक के अनेक आयाम हैं। सबसे पहले , यह प्रत्येक व्यक्ति पर खुद को ऊपर उठाने की जिम्मेदारी तय करता है। सामान्य प्रवृत्ति होती है कि अपनी असफलता का दोष परिवार , दोस्तों , सहकर्मियों , परिस्थितियों , काम करने की स्थिति , स्थान आदि जैसे किसी अन्य पर डाल देते हैं। जब कर्म किए जाते हैं जिन्हें या तो बुरे के रूप में चिह्नित किया जाता है या वांछित कर्मफल नहीं मिलता है तो अपने आप को दोषी मानते हैं और पछतावे से भर जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि यह दूसरों के प्रति कई गहरे विद्वेष और कड़वाहट पैदा करता है जो कभी-कभी जीवनभर बना रहता है। दूसरी ओर , जब भी हमारी स्मृति हमें हमारे पछतावे की याद दिलाती है तो हम बार-बार खुद को सजा देते हैं। परिस्थिति कैसी भी हो यह श्लोक हमें स्वयं को बेहतर बनाने में मदद करता है। श्रीकृष्ण ने पहले 4.34 श्लोक में आश्वासन दिया कि जब हम साष्टांग प्रणाम , प्रश्न क...

110. द्वंद्वातीत से शांति

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  श्रीकृष्ण कहते हैं “ जिसको शास्त्र संन्यास कहते हैं उसी को तू योग जान , क्योंकि संकल्पों का त्याग न करनेवाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता ” ( 6.2) । इससे पहले श्लोक 4.19 में यह कहा गया था कि एक महापुरुष के कर्म कामना और संकल्प से मुक्त होते हैं (काम - संकल्प - वर्जिता:)। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “ योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिए योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगारूढ़ हो जाने पर उस योगारूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पों का अभाव है , वही कल्याण में हेतु कहा जाता है ( 6.3) । जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है , उस काल में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है ” ( 6.4) । हमारी मान्यता है कि कर्म मनोवांछित कर्मफल प्राप्त करने से प्रेरित होते हैं नहीं तो कोई भी व्यक्ति कर्म क्यों करेगा। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यदि हम किसी चीज के बारे में नहीं जानते हैं या उसका अनुभव नहीं किया है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह अस्तित्व में नहीं है। पहला , यह हमारे उन पूर्व क...

109. जो कर्मफल त्याग दे वही संन्यासी

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जीवन में बहुत से उतार चढ़ाव आते हैं। यह निर्भर करता है कि हम उनसे कैसे निपटते हैं। यह स्वाभाविक है कि जब कोई मुश्किल दौर से गुजर रहा होता है तो वह निराश हो जाता है और कर्मों को त्यागने की ओर उन्मुख हो जाता है क्योंकि हम सभी इस भ्रम में हैं कि हमारे कर्म के साथ-साथ दूसरों के कर्म भी हमें सुख या दु:ख देते हैं। अर्जुन भी इसी भ्रम से गुजर रहे हैं और युद्ध लड़ने का कर्म छोड़ना चाहते हैं। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि “ जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है , वह संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है ” ( 6.1) । करने योग्य कर्म के संबंध में जितना स्पष्टीकरण दिया जाए उतना ही ज्यादा संशय पैदा कर सकता है क्योंकि यह अनुभवात्मक होता है। तैरना सीखने के लिए व्यक्ति को पानी मे गोते लगाने पड़ते हैं और ठीक इसी तरह करने योग्य कर्म को समझने के लिए जीवन का अनुभव करना होगा। इन्द्रियों की सहायता के बगैर खुश रहना हमारी प्रगति को मापने का वैसा ही मानदंड है जैसे तैरने के लिए तैरना। इसी तरह एक बीज...

108. क्रोध को पार करना

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श्रीकृष्ण कहते हैं , वे लोग जो इच्छा और क्रोध से मुक्त हैं , जिनका मन नियंत्रित है और जो आत्मज्ञानी हैं , वे इस दुनिया और परे दोनों में पूरी तरह से मुक्त हैं ( 5.26) । प्रश्न यह है कि कामना के रोग और क्रोध के पागलपन से मुक्त कैसे हों। जिस प्रकार हर तूफान के केंद्र में एक गहरी शांति होती है , उसी प्रकार इच्छा और क्रोध के तूफान के बीच भी हमारे भीतर एक इच्छाहीन और क्रोधहीन केंद्र विद्यमान है ; और यह उस केंद्र तक पहुँचने के बारे में है। इसके लिए ‘मैं’ को त्यागने के लिए साहस की आवश्यकता होती है क्योंकि ‘मैं’ इच्छा का एक मूल अंग है। एक प्रभावी तकनीक यह है कि हम अतीत की किसी ऐसी स्थिति को , जिसमें हम इच्छा या क्रोध से ग्रस्त थे , पुनः जीकर साक्षीभाव से देखें। उसी स्थिति को इस विकसित जागरूकता के साथ पुनः जीना चाहिए कि ‘ सभी प्राणियों में वही एक आत्मा विद्यमान है , और भिन्न-भिन्न लोग एक वास्तविकता को अलग-अलग तरीकों से देखते हैं ’ । भारतीय परंपराएँ जीवन को लीला अर्थात् सिर्फ एक नाटक कहती हैं और इसमें गंभीरता से लेने लायक कुछ भी नहीं है। दूसरा तरीका यह है कि 7-10 दिनों तक ऐसे जीन...

107. आनन्द के लिये ध्यान

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पीनियल ग्रंथि एक मटर के आकार का , पाइन शंकु के प्रतिरूप का अंग है जो मस्तिष्क के केंद्र में , सीधे दो भृकुटि के बीच में स्थित होता है। शारीरिक रूप से यह न्यूरोट्रांसमीटर मेलाटोनिन और सेरोटोनिन का उत्पादन करता है जो क्रमश: नींद के साथ-साथ मनोदशा के लिए जिम्मेदार होते हैं। इसे तीसरी आंख के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि इसमें सामान्य आंख की तरह फोटोरिसेप्टर होते हैं। सभी संस्कृतियों ने इसे विभिन्न तरीकों से वर्णित किया है ; जैसे आत्मा के आसन ; आध्यात्मिक ज्ञान के लिए जिम्मेदार ; एक छठी इन्द्रिय जो पांचों इन्द्रियों से परे देख सकती है ; आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक ; भौतिक और आध्यात्मिक दुनिया के बीच संबंध। भारतीय सन्दर्भ में भृकुटि के बीच की जगह को आज्ञा चक्र कहा जाता है जो पीनियल ग्रंथि का प्रतिनिधित्व करता है। यह पृष्ठभूमि हमें इन्द्रियों और मन को नियंत्रित करने के लिए श्रीकृष्ण की विधि को समझने में मदद करेगी जब वे कहते हैं “ बाहर के विषय भोगों को न चिंतन करता हुआ बाहर ही निकालकर और नेत्रों की दृष्टि को भृकुटि के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अ...