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Showing posts from January, 2023

46. स्वयं से संतृप्त

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  अर्जुन ने स्थितप्रज्ञ , जिसने समाधि प्राप्त कर ली है , के लक्षण क्या हैं और एक स्थितप्रज्ञ कैसे बोलता है , बैठता है और चलता है , के बारे में जानना चाहा ( 2.54) । श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि स्थितप्रज्ञ पुरुष मन की सभी कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा के द्वारा आत्मा में ही संतुष्ट रहता है ( 2.55) । जब व्यक्ति स्वयं में संतुष्ट हो जाता है तो इच्छाएँ और उनके पीछे छिपे संकल्प स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। इच्छाओं के समाप्त होने पर हमारे सभी कर्म निष्काम कर्म बन जाते हैं। श्रीकृष्ण हमारे विभाजन करने के अभ्यस्त मन की मदद करने के लिए मानक यानी बेंचमार्क निर्धारित करते हैं। हम अपनी आध्यात्मिक यात्रा की प्रगति को इन मानकों से माप सकते हैं। हम जो हैं उससे अलग होने की हमेशा इच्छा रखते हैं। हम बहुत जल्दी ऊब जाते हैं। इस अवस्था को अर्थशास्त्र में कहते हैं ‘संतृप्त इच्छा हमें प्रेरित नहीं करती है’। दुर्भाग्य यह है कि हर कोई इसे अन्य सभी पर एक युक्ति के रूप में उपयोग करता है जिससे स्थितप्रज्ञ बनना कठिन हो जाता है। उदाहरण के लिए उपभोक्ता उत्पाद कंपनियां नियमित रूप से नए उत्पाद/मॉडल पेश करती...

45. स्थिर बुद्धि

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    हमारे जीवन के सामान्य क्रम में जब हम एक ही विषय पर परस्पर विरोधी राय सुनते हैं तो हम भ्रमित हो जाते हैं -चाहे वह समाचार , दर्शन , दूसरों की मान्यताएँ आदि हों। श्रीकृष्ण कहते हैं हम योग तभी प्राप्त करेंगे जब विभिन्न मतों को सुनने के बावजूद बुद्धि निश्चल और समाधि में स्थिर रहेगी ( 2.53) । श्रीकृष्ण ‘श्रवण’ को एक रूपक के रूप में प्रयोग करते हैं और यह बात सभी इन्द्रियों पर लागू होता है। इस श्लोक के लिए सबसे अच्छा उदाहरण एक पेड़ है जिसका ऊपरी भाग दिखाई देता है और निचला भाग इसका अदृश्य जड़ है। हवाओं की ताकत के आधार पर शाखाएँ और पत्तियाँ हिलती-डुलती रहती हैं जबकि दूसरी ओर जड़ प्रणाली इनसे प्रभावित नहीं होती है। इसका अभिप्राय यह है कि आंतरिक भाग समाधि की तरह निश्चल रहता है और स्थिरता के साथ-साथ पोषण प्रदान करने का अपना कर्तव्य निभाता रहता है। यह पेड़ के लिए योग के समान है जहाँ बाहरी भाग कम्पन करता है और आंतरिक भाग निश्चल रहता है। अज्ञान की अवस्था में हमारा मन चंचल होता है जो बाहरी उत्तेजनाओं से स्वतः ही प्रभावित होता है। बाहरी दुनिया को ये प्रभाव तात्कालिक प्रतिक्रियाओं के रूप ...

44. क्या हमारा है, क्या नहीं

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  श्रीकृष्ण कहते हैं “ जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूप दलदल को भलीभांति पार कर जायेगी , उस समय तू सुने हुए और सुनने में आनेवाले इस लोक और परलोक सम्बन्धी सभी भोगों से वैराग्य (निर्वेद) को प्राप्त हो जायेगा ” ( 2.52) । इसका तात्पर्य यह है कि जब हम मोह पर विजय प्राप्त कर लेते हैं तब हमारी इंद्रियाँ हमें प्रभावित नहीं करती हैं। श्रीकृष्ण ने यहाँ सुनने को रूपक के रूप में चुना क्योंकि हम प्रायः दूसरों के शब्दों जैसे प्रशंसा , आलोचना , गपशप आदि से प्रभावित होते हैं। शब्दों के अभाव के कारण अहंकार की तरह मोह का वर्णन करना भी मुश्किल है। मूल रूप से क्या हमारा है और क्या नहीं के बीच अंतर करने की हमारी अक्षमता ही मोह है। यह भौतिक संपत्ति और भावनाओं का स्वामित्व है जबकि वास्तव में हम इनके मालिक नहीं होते हैं। हम उस चीज से जुड़े रहने की कोशिश करते हैं जो हमारी नहीं है जबकि हमें इस बारे में कोई पता नहीं होता कि हम देही/आत्मा हैं। श्रीकृष्ण इस घटना को ‘कलिलं’ या आध्यात्मिक अंधकार कहते हैं। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं कि जब हम इस अंधकार को पार करते हैं तो हम ‘निर्वेद’ की अवस्था प्राप्त करते हैं। ...

43. जन्म-मृत्यु के भ्रमपूर्ण बंधन

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  श्रीकृष्ण कहते हैं “ समबुद्धि से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होनेवाले फल को त्यागकर जन्मरूपी बन्धन से मुक्त हो निर्विकार परमपद को प्राप्त हो जाते हैं ” ( 2.51) । यह श्लोक उस सामान्य धारणा के विपरीत प्रतीत होता है कि हम जन्म और मृत्यु के अधीन हैं। यह धारणा हमारे चारों ओर विद्यमान भौतिक जीवन-रूपों के जन्म और मृत्यु के अवलोकन से उत्पन्न होती है। अतः इस श्लोक को उसके उचित संदर्भ में समझना आवश्यक है। लंबे समय तक मानव जाति का मानना था कि सूर्य स्थिर पृथ्वी के चारों ओर घूमता है और बाद में पता चला कि पृथ्वी ही सूर्य के चारों ओर घूमती है। अंत में हमारी समझ अस्तित्वगत सत्य के अनुरूप हुई , जिसका अर्थ है कि समस्या हमारी सत्य की गलत व्याख्या के कारण थी जो हमारी इन्द्रियों की सीमाओं द्वारा लाए गए भ्रम से उत्पन्न हुई थी। जन्म और मृत्यु के बारे में हमारे भ्रम के साथ भी ऐसा ही है। श्रीकृष्ण गीता की शुरुआत में देही या आत्मा के बारे में बताते हैं जो सभी में व्याप्त है और अजन्मा , नित्य , शाश्वत और पुरातन है ( 2.20) । वह आगे कहते हैं कि आत्मा भौतिक शरीरों को बदल देती है जैसे हम पुराने कपड...

42. संतुलित निर्णय

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  तथ्यों के आधार पर हम अपने लिए , अपने परिवार और समाज के लिए कई निर्णय लेते हैं। श्रीकृष्ण हमें इस निर्णय लेने की क्षमता को अगले स्तर तक ले जाने के लिए प्रोत्साहित करते हुए कहते हैं ‘योग: कर्मसु कौशलम्’ ( 2.50) । सामान्यतः इस श्लोक की व्याख्या इस रूप में की जाती है कि योग का अर्थ किसी कार्य या पेशे में निपुणता प्राप्त करना है। परन्तु इसका गूढ़ संदेश यह है कि समत्व की अवस्था में किया गया प्रत्येक कर्म सामंजस्य और संतुलन से परिपूर्ण होता है। यह एक फूल की सुंदरता और सुगंध की तरह फैलने वाले सामंजस्य का अनुभव करने के लिए कर्तापन और अहंकार को छोड़ने के बारे में है। कर्ता के रूप में हमारे सभी निर्णय अपने और अपने परिवार के लिए सुख प्राप्त करने और दु:ख से बचने के लिए निर्देशित होते हैं। यात्रा का अगला स्तर संतुलित निर्णय लेना है , खासकर जब हम संगठनों और समाज के लिए जिम्मेदार हैं। इस स्तर पर कर्तापन की भावना बनी रहती है। यहाँ श्रीकृष्ण उस परम स्तर की बात कर रहे हैं जहाँ कर्तापन को ही त्याग दिया जाता है और ऐसा व्यक्ति जो कुछ भी करता है वह संतुलित होता है। सर्वव्यापी चैतन्य उनके लिए कर्ता बन...