46. स्वयं से संतृप्त
अर्जुन ने स्थितप्रज्ञ , जिसने समाधि प्राप्त कर ली है , के लक्षण क्या हैं और एक स्थितप्रज्ञ कैसे बोलता है , बैठता है और चलता है , के बारे में जानना चाहा ( 2.54) । श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि स्थितप्रज्ञ पुरुष मन की सभी कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा के द्वारा आत्मा में ही संतुष्ट रहता है ( 2.55) । जब व्यक्ति स्वयं में संतुष्ट हो जाता है तो इच्छाएँ और उनके पीछे छिपे संकल्प स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। इच्छाओं के समाप्त होने पर हमारे सभी कर्म निष्काम कर्म बन जाते हैं। श्रीकृष्ण हमारे विभाजन करने के अभ्यस्त मन की मदद करने के लिए मानक यानी बेंचमार्क निर्धारित करते हैं। हम अपनी आध्यात्मिक यात्रा की प्रगति को इन मानकों से माप सकते हैं। हम जो हैं उससे अलग होने की हमेशा इच्छा रखते हैं। हम बहुत जल्दी ऊब जाते हैं। इस अवस्था को अर्थशास्त्र में कहते हैं ‘संतृप्त इच्छा हमें प्रेरित नहीं करती है’। दुर्भाग्य यह है कि हर कोई इसे अन्य सभी पर एक युक्ति के रूप में उपयोग करता है जिससे स्थितप्रज्ञ बनना कठिन हो जाता है। उदाहरण के लिए उपभोक्ता उत्पाद कंपनियां नियमित रूप से नए उत्पाद/मॉडल पेश करती...