43. जन्म-मृत्यु के भ्रमपूर्ण बंधन
श्रीकृष्ण
कहते हैं
“समबुद्धि से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होनेवाले फल
को त्यागकर जन्मरूपी बन्धन से मुक्त हो निर्विकार परमपद को प्राप्त हो जाते हैं” (2.51)। यह श्लोक उस सामान्य धारणा के विपरीत प्रतीत होता है कि हम जन्म और मृत्यु के
अधीन हैं। यह धारणा हमारे चारों ओर विद्यमान भौतिक जीवन-रूपों के जन्म और मृत्यु के
अवलोकन से उत्पन्न
होती है। अतः इस श्लोक को उसके उचित संदर्भ में समझना आवश्यक है।
लंबे
समय तक
मानव जाति का मानना था कि सूर्य स्थिर पृथ्वी के चारों ओर
घूमता है और बाद में पता चला कि पृथ्वी ही सूर्य के चारों ओर घूमती है। अंत में हमारी समझ अस्तित्वगत सत्य के अनुरूप हुई, जिसका अर्थ है कि समस्या
हमारी सत्य की गलत व्याख्या के कारण थी जो हमारी इन्द्रियों की सीमाओं द्वारा लाए
गए भ्रम से उत्पन्न हुई थी। जन्म और मृत्यु के बारे में हमारे भ्रम के साथ भी ऐसा
ही है।
श्रीकृष्ण
गीता की शुरुआत में देही या आत्मा के बारे में बताते हैं जो
सभी में व्याप्त है और अजन्मा, नित्य, शाश्वत
और पुरातन है (2.20)। वह आगे कहते हैं कि आत्मा भौतिक शरीरों को बदल देती है जैसे हम पुराने
कपड़ों को नए कपड़े पहनने के लिए त्याग देते हैं (2.22)।
जब वे कहते हैं कि संतुलित बुद्धि से व्यक्ति जन्म और मृत्यु के बंधनों से मुक्त
हो जाता है
तो इसका तात्पर्य यह है कि वह स्वयं को देही /आत्मा के
अस्तित्वगत सत्य के साथ जोड़ लेता है। यह पृथ्वी के चारों ओर घूमने वाले सूर्य के
भ्रम से बाहर निकलकर सूर्य के चारों ओर घूमने वाली पृथ्वी के अस्तित्वगत सत्य के साथ
अपने आप को जोड़ने जैसा है।
हम
बहुमत के साथ तादात्म्य रखते हैं लेकिन जो बहुसंख्यक जन्म और
मृत्यु को मानते हैं वे हमें शाश्वत आत्मा के अस्तित्वगत सत्य
का मार्गदर्शन नहीं कर सकते हैं क्योंकि यह केवल संतुलित बुद्धि
ही कर सकती है।
श्रीकृष्ण
ने ध्रुवीयता से परे की अवस्था के बारे में भी उल्लेख किया है। आमतौर पर इसे स्वर्ग के रूप में और कभी-कभी परमपद के रूप में वर्णित किया जाता है जो
कहीं बाहर है। यह श्लोक इंगित करता है कि यह मार्ग हमारे भीतर है। यह कर्मों को
त्यागे बिना कर्मफल के त्याग का मार्ग है (2.47)।

Comments
Post a Comment