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Showing posts from March, 2023

60. अहंकार मिटना ही है मंजिल

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  श्रीकृष्ण कहते हैं कुछ इस (आत्मा) को चमत्कार के रूप में देखते हैं , कुछ इसे चमत्कार के रूप में बोलते हैं , अन्य लोग इसे चमत्कार के रूप में सुनते हैं और फिर भी इसे ‘ कोई नहीं ’ जानता है ( 2.29) । यहाँ ‘कोई नहीं’ का उपयोग एक प्रेक्षक को संदर्भित करता है जो प्रेक्षित (आत्मा) को समझने के लिए अपनी इन्द्रियों का उपयोग करता है। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं जब तक इन दोनों के बीच दूरी है तब तक प्रेक्षक आत्मा को नहीं समझ सकता है। एक बार एक नमक की गुड़िया समुद्र का पता लगाना चाहती थी और उसने अपनी यात्रा शुरू की। प्रचंड तरंगों के माध्यम से यह समुद्र के गहरे हिस्सों में प्रवेश करती है और धीरे-धीरे इसमें घुलने लगती है। जब तक यह सबसे गहरे भाग में प्रवेश करती है तब तक यह पूरी तरह से घुल जाती है और समुद्र का हिस्सा बन जाती है। कहा जा सकता है कि यह स्वयं सागर बन गई है और नमक की गुड़िया का कोई अलग अस्तित्व नहीं है। प्रेक्षक (नमक की गुड़िया) प्रेक्षित (महासागर) बन गयी है जो अनिवार्य रूप से विभाजन को समाप्त कर एकता लाना है। उपरोक्त कथा हमें अहंकार को समझने में सहायता करती है। अहंकार सदैव हमार...

59. अहंकार से बचो

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  श्रीकृष्ण ने देखा कि अर्जुन ‘अहं कर्ता’ यानी अहंकार की भावना से अभिभूत है और यह उसके विषाद का कारण है। अहंकार के प्रति जागरूकता हमें उसे पार करने में सहायता करेगी। अहंकार के कई रूप हैं। गर्व अहंकार का ही एक रूप है। जब कोई व्यक्ति सफलता/जीत/लाभ के सुख से गुजरता है तो उस अहंकार को अभिमान कहा जाता है और जब कोई विफलता/हार/हानि की पीड़ा से गुजरता है तो उस अहंकार को उदासी , दु:ख , क्रोध कहा जाता है। जब हम दूसरों को सुखी देखते हैं तो यह ईर्ष्या है और जब हम दूसरों को दु:खी देखते हैं तो यह सहानुभूति है। अहंकार हम पर हावी होता है जब हम भौतिक संपत्ति एकत्र कर रहे होते हैं और जब हम उनको दान करते हैं तब भी वह मौजूद होता है। यह संसार में कर्म करने के लिए और संन्यास लेने के लिए भी प्रेरित करता है। यह बनाने के पीछे तो है , साथ ही बिगाड़ने के पीछे भी है। यह ज्ञान में भी है और अज्ञान में भी। प्रशंसा अहंकार को बढ़ावा देती है और आलोचना पीड़ा देती है जिसकी वजह से हम दूसरों के छल का शिकार हो जाते है। संक्षेप में अहंकार किसी न किसी अर्थ में हर भावना के पीछे छिपा होता है जो हमारे बाहरी व्यवहार को...

58. विषाद से ज्ञानोदय तक

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  श्रीकृष्ण कहते हैं “ जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं वैसे ही समस्त इच्छाएँ (कामनाएँ) जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किये बिना ही समा जाते हैं , वही पुरुष परम शांति को प्राप्त होता है , भोगों को चाहने वाला नहीं ” ( 2.70) । वे आगे कहते हैं “ जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्यागकर ममतारहित , अहंकाररहित और स्पृहा रहित हुआ विचरता है , वही शांति को प्राप्त होता है ( 2.71) । यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है , इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थिर होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाता है ” ( 2.72) । श्रीकृष्ण इस शाश्वत अवस्था (मोक्ष-परम स्वतंत्रता और आनन्द) की तुलना करने के लिए समुद्र का उदाहरण देते हैं और नदियाँ इन्द्रियों द्वारा लगातार प्राप्त होने वाली उत्तेजनाएँ हैं। सागर की तरह निश्चल स्थिति प्राप्त करने के बाद मनुष्य स्थिर रहता है , भले ही प्रलोभन और इच्छाएँ   उनमें प्रवेश करती रहें। दूसरे , जब नदियाँ समुद्र से मिल...

57. आध्यात्मिक जागरण

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  श्रीकृष्ण कहते हैं “ सम्पूर्ण प्राणियों के लिये जो रात्रि के समान है , उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में संयमी योगी जागता है और जिन नाशवान् सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं , परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिये वह रात्रि के समान है ” ( 2.69) । लाक्षणिक दृष्टि से यह श्लोक ‘शारीरिक रूप से जाग्रत लेकिन आध्यात्मिक रूप से सोए हुए’ और इसके विपरीत होने के विचार को सामने लाता है। इसके अलावा यह शाब्दिक व्याख्या भी प्रस्तुत करता है। जीने के दो तरीके हैं । पहला वह है जहाँ हम अपने सुखों के लिए इन्द्रियों पर निर्भर हैं और दूसरा वह है जहाँ हम इन्द्रियों से स्वतंत्र हैं और वे हमारे नियंत्रण में रहती हैं। पहली श्रेणी के लोगों के लिए जीने का दूसरा तरीका एक अज्ञात दुनिया होगी और रात इस अज्ञानता का रूपक है। जब हम किसी एक इन्द्रिय-उपकरण का उपयोग कर रहे होते हैं तब हमारा ध्यान कहीं और होता है। इसका अर्थ है कि हम उसका उपयोग तो कर रहे हैं परन्तु जागरूकता के साथ नहीं बल्कि यांत्रिक रूप से कर रहे हैं। उदाहरण के लिए खाना खाते समय हमारा ध्यान प्रायः खाने पर नहीं...

56. जीवन की चार अवस्थाएँ

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  श्रीकृष्ण कहते हैं “ जैसे जल में चलनेवाली नाव को वायु हर लेती है , वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है , वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है ” ( 2.67) । हवा हमारी इच्छाओं का एक रूपक है जो हमारे मन और इन्द्रियों को प्रभावित करती है और बुद्धि (नाव) को अस्थिर कर देती है। इच्छाओं के सन्दर्भ में जीवन को चार चरणों में विभाजित किया जाता है। ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , वानप्रस्थ और संन्यास। यह विभाजन न केवल उम्र पर बल्कि जीवन शैली पर भी आधारित होता है। पहले चरण में कुछ बुनियादी कौशल के साथ बड़ा होना , सैद्धांतिक ज्ञान प्राप्त करना और शारीरिक शक्ति एकत्र करना शामिल है। दूसरे चरण में यह परिवार , कर्म , कौशल में वृद्धि , संपत्ति और यादें इकट्ठा करना , जीवन के विभिन्न पहलुओं के संपर्क में आना और सफलता या असफलता के साथ जुनून और इच्छाओं का पीछा करते हुए जीवन के अनुभव प्राप्त करना है। इस प्रक्रिया के माध्यम से व्यक्ति ज्ञान , कौशल और जीवन के अनुभवों का मिश्रण प्राप्त करता है जो जागरूकता के लिए प्रशिक्षण स्थल है। तीसरे चरण में...

55. मध्य में केंद्रित

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  श्रीकृष्ण कहते हैं अयुक्त (अस्थिर) मनुष्य में निश्चयात्मिका बुद्धि और निष्काम भावना दोनों नहीं होती है और परिणामस्वरूप उसे शांति नहीं मिलती और अशांत व्यक्ति के लिए कोई सुख नहीं होता ( 2.66) । श्रीकृष्ण ने समत्व ( 2.38 एवं 2.48) पर जोर दिया और यह श्लोक एक अलग दृष्टिकोण से उसी पर प्रकाश डालता है। जब तक व्यक्ति मध्य में केंद्रित नहीं होता , तब तक वह मित्र , शत्रु , कार्य , जीवनसाथी , संतान , धन , सुख , शक्ति , संपत्ति आदि जैसे कुछ केंद्रों में स्वयं को स्थिर कर लेता है और यही अयुक्त की पहचान है। यदि कोई धन पर केंद्रित है तो उसकी सभी योजनाएँ - रिश्ते , स्वास्थ्य जैसी चीजों की कीमत पर धन को अधिकतम करने के इर्द-गिर्द घूमती हैं। सुख जिसका केंद्र है वह सुख प्राप्त करने के लिए धोखा देने से लेकर कुछ भी करने से नहीं हिचकिचाता है। जीवनसाथी के प्रति उन्मुख व्यक्ति , उनके जीवनसाथी के साथ लोगों के व्यवहार के आधार पर रिश्तों का मूल्यांकन करता है। जो शत्रु केंद्रित है वह अपने शत्रुओं को नुकसान पहुँचाने में लगा रहता है भले ही इससे उसका खुद का नुकसान हो रहा हो। जब हम दूसरों से बंधे (जुड़े)...

54. आध्यात्मिकता का कारण और प्रभाव

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  श्रीकृष्ण कहते हैं संतुष्ट व्यक्ति की बुद्धि स्थिर होती है और उसके समस्त दुःख नष्ट हो जाते हैं (2.65)। दुःख चंचल बुद्धि का परिणाम है और जब बुद्धि स्थिर हो जाती है तब दुःख स्वतः समाप्त हो जाता है। यह श्लोक हमारी उस सामान्य धारणा के विपरीत है कि इच्छाओं की पूर्ति होने पर , सुख प्राप्त होने पर और दुःख समाप्त होने पर ही हम संतुष्ट होते हैं। किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं हमें पहले संतुष्ट होना सीखना चाहिए ; शेष सब उसके बाद स्वतः घटित हो जाएगा। उदाहरण के लिए हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि बुखार , दर्द आदि जैसे लक्षण होने पर हम स्वस्थ नहीं हैं। इन लक्षणों का दमन हमें तब तक स्वस्थ नहीं करेगा जब तक इन लक्षणों के जड़ का इलाज नहीं किया जाता है। वहीं दूसरी ओर पौष्टिक आहार , अच्छी नींद , फिटनेस व्यवस्था आदि हमें अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करते हैं। इसी तरह भय , क्रोध और द्वेष जो दु:ख का हिस्सा हैं , संतोष की कमी के संकेत हैं और उनका दमन हमें अपने आप संतुष्ट नहीं करेगा। इन संकेतों को दबाकर स्वीकार्य व्यवहार करने के लिए कई त्वरित सुधारों का अभ्यास किया जाता है। लेकिन यह दमन बाद में और अधिक ...