60. अहंकार मिटना ही है मंजिल


 

श्रीकृष्ण कहते हैं कुछ इस (आत्मा) को चमत्कार के रूप में देखते हैं, कुछ इसे चमत्कार के रूप में बोलते हैं, अन्य लोग इसे चमत्कार के रूप में सुनते हैं और फिर भी इसे कोई नहीं जानता है (2.29)

यहाँ ‘कोई नहीं’ का उपयोग एक प्रेक्षक को संदर्भित करता है जो प्रेक्षित (आत्मा) को समझने के लिए अपनी इन्द्रियों का उपयोग करता है। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं जब तक इन दोनों के बीच दूरी है तब तक प्रेक्षक आत्मा को नहीं समझ सकता है।

एक बार एक नमक की गुड़िया समुद्र का पता लगाना चाहती थी और उसने अपनी यात्रा शुरू की। प्रचंड तरंगों के माध्यम से यह समुद्र के गहरे हिस्सों में प्रवेश करती है और धीरे-धीरे इसमें घुलने लगती है। जब तक यह सबसे गहरे भाग में प्रवेश करती है तब तक यह पूरी तरह से घुल जाती है और समुद्र का हिस्सा बन जाती है। कहा जा सकता है कि यह स्वयं सागर बन गई है और नमक की गुड़िया का कोई अलग अस्तित्व नहीं है। प्रेक्षक (नमक की गुड़िया) प्रेक्षित (महासागर) बन गयी है जो अनिवार्य रूप से विभाजन को समाप्त कर एकता लाना है।

उपरोक्त कथा हमें अहंकार को समझने में सहायता करती है। अहंकार सदैव हमारी सम्पत्तियों, विचारों और कर्मों के साथ हमारी पहचान जोड़कर हमें वास्तविकता से पृथक और अलग बनाए रखने का प्रयास करता है। कोई भी व्यक्ति सामान्य नहीं रहना चाहता और अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नहीं रह पाता है।

लेकिन यात्रा एकता और एकात्मकता की है। यह तभी होता है जब अहंकार नमक की गुड़िया की तरह अपना अस्तित्व खो देता है। इसका अर्थ है कि हमारे पास जो कुछ भी है, वस्तु और विचार, दोनों को दांव पर लगा देना। यह ऐसी यात्रा है जिसमें मंजिल तब मिलती है जब अहंकार का अस्तित्व समाप्त हो जाता है; जहाँ ‘मैं’, ‘मेरा’ छोड़ने योग्य उपकरण हैं, न कि पहचान के।

सुख-दु:ख के ध्रुवों के शिखर पर हमें निरहंकार की झलक मिलती है। बोध के इन क्षणों में हमें इस बात की झलक मिलती है कि हम क्या हैं और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम क्या जानते हैं, हम क्या करते हैं और हमारे पास क्या है।

निमित्त-मात्र की अवस्था में ‘मैं कर्ता हूँ’ का भाव यानी अहंकार विलीन होने लगता है। तब यह स्पष्ट होता है कि कर्मों का वास्तविक कर्ता परमात्मा है और हम केवल उसके हाथों में एक उपकरण हैं जिसके माध्यम से कर्म घटित होते हैं।


Comments

Popular posts from this blog

184. त्याग से शांति

183. अभ्यास से सिद्धि

115. ध्यान की एक विधि