106. खुशियों का लगाम
एक बार मध्य एशिया से घोड़े पर सवार होकर एक आक्रमणकारी ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया और विजय जुलूस निकालना चाहा। एक हाथी को सजाया गया और उस पर चढ़ने के बाद उसने हाथी की लगाम मांगी। जब बताया गया कि यह एक महावत द्वारा नियंत्रित होता है तो वह नीचे कूद गया और अपने घोड़े को यह कहते हुए बुलवाया कि वह कभी ऐसी सवारी नहीं करता जिसकी लगाम उसके हाथ में नहीं होती। इसी तरह हमें आत्म निरीक्षण करने की आवश्यकता है कि क्या हमारी खुशी और भावनाओं की बागडोर हमारे हाथ में है या किसी और के हाथ में है। हम सभी सोचते हैं कि ये बागडोर हमारे हाथ में है लेकिन हकीकत यह है कि बागडोर किसी और के पास होती है। यह एक दोस्त हो सकता है , परिवार या कार्यस्थल में कोई व्यक्ति जिसकी मनोदशा , शब्द , राय , प्रशंसा और आलोचना हमें सुखी या दु:खी करती है ; भोजन , पेय या भौतिक चीजें ; अनुकूल या प्रतिकूल स्थिति ; यहाँ तक कि हमारा अतीत या भविष्य भी। इस संबंध में श्रीकृष्ण कहते हैं “ जो साधक इस मनुष्य शरीर में , शरीर का नाश होने से पहले-पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है , वही पुरुष यो...