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Showing posts from October, 2022

31. मानसिक शांति की आधारशिला

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श्रीकृष्ण कहते हैं “ कर्मयोग में बुद्धि निश्चयात्मिका होती है और जो अस्थिर हैं उनकी बुद्धि बहुत भेदोंवाली होती है ” ( 2.41) । समत्व ही योग है -अर्थात् जीवन में अनुभव होने वाले द्वन्द्वों जैसे सुख-दुःख , जय-पराजय और लाभ-हानि के बीच संतुलन बनाए रखना (2.48 एवं 2.38)। कर्मयोग इन ध्रुवों को पार करने का मार्ग है जो अंतत: एक निश्चयात्मिका बुद्धि में परिणत होता है। दूसरी ओर एक अस्थिर बुद्धि हमें मानसिक शांति से वंचित कर देती है। हमारी सामान्य धारणा यह है कि जब हम सुख , जीत और लाभ प्राप्त करते हैं तब मन की शांति अपने आप आ जाती है , लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं कर्मयोग के अभ्यास से उत्पन्न एक निश्चयात्मिका बुद्धि हमें द्वन्द्वों को पार करने में मदद करके मानसिक शांति देती है। अस्थिरबुद्धि हर परिस्थिति , परिणाम और व्यक्ति को शुभ-अशुभ , अच्छा-बुरा मानकर उसका वर्गीकरण करती रहती है। हमारा व्यवहार ऐसे विभाजनों से बहुत ज्यादा प्रभावित होता है। अपने कार्यस्थल पर हम एक मापदंड अपने से नीचे के लोगों पर और दूसरा अपने से ऊपर के लोगों पर लागू करते हैं। परिवार में भी विभिन्न परिस्थितियों...

30. कम प्रयास से बड़ा लाभ

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श्रीकृष्ण आश्वासन देते हैं कि कर्मयोग का थोड़ा सा भी आचरण अच्छे परिणाम देते हैं और यह मार्ग हमें बड़े भय से रक्षा प्रदान करता है ( 2.40) । ध्यान देने योग्य बात यह है कि जहाँ सांख्ययोग शुद्ध जागरूकता है , वहीं कर्मयोग में प्रयास करना पड़ता है। यह उन साधकों के लिए भगवान् श्रीकृष्ण का आश्वासन है जिन्होंने अभी-अभी अपनी आध्यात्मिक यात्रा शुरू की है और जो इस प्रयास को कठिन पाते हैं। श्रीकृष्ण हमारी कठिनाई को समझते हैं और हमें विश्वास दिलाते हैं कि एक छोटा सा प्रयास भी अद्भुत परिणाम दे सकता है। वह हमें निष्काम कर्म और समत्व के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। एक तरीका यह है कि श्रद्धा के साथ श्रीकृष्ण द्वारा बताये गए कर्मयोग का अभ्यास शुरू करें। समय के साथ जब हम अपने अनुभवों को लगातार कर्मयोग के दृष्टिकोण से देखते हैं तो हमारी समझ धीरे-धीरे गहरी होती जाती है और यह हमें हमारे अंतरात्मा के और करीब ले जाती है। एक और तरीका यह है कि हम अपने भय को समझें और समझें कि कर्मयोग का अभ्यास भय को कैसे दूर कर सकता है। हमारी आंतरिक अपेक्षाओं और दुनिया की वास्तविकता की विसंगति का ...

29. पानी, रेत और पत्थर पर लेखन

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श्रीकृष्ण कहते हैं सांख्ययोग ( 2.11-2.38) के बारे में स्पष्ट करने के बाद वे अब योग अर्थात् कर्मयोग की व्याख्या करेंगे , जिसके अभ्यास से व्यक्ति कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा ( 2.39) । सांख्ययोग की व्याख्या करते हुए श्रीकृष्ण अर्जुन को जागरूक करते हैं कि वह अविनाशी चैतन्य हैं जिसकी मृत्यु नहीं होती है। इसी श्लोक से श्रीकृष्ण कर्मयोग के द्वारा इसकी व्याख्या करने लगते हैं। इसलिए कर्मबंधन और योग को इसी सन्दर्भ में समझने की जरूरत है। योग का शाब्दिक अर्थ ‘ मेल ’ है और गीता में इसका प्रयोग कई संदर्भों में किया गया है। श्रीकृष्ण समत्व को ही योग कहते हैं ( 2.48) जहाँ सफलता या असफलता के प्रति आसक्ति को छोड़ दिया जाता है। श्रीकृष्ण का जोर सुख-दु:ख , जीत-हार और लाभ-हानि के प्रति समत्व बनाए रखने पर है (2.38) । कर्मबंधन उन सुखद या दुःखद अनुभवों और छापों का संचय है जो हमारे कर्मों और उनके परिणामों से उत्पन्न होते हैं , जब हम उनके प्रति आसक्ति , द्वेष अथवा असंतुलित प्रतिक्रिया करते हैं। वैज्ञानिक रूप से इन्हें तंत्रिका प्रतिरूप ( neural pattern ) कहा जाता है। दिमाग पर यह चिह्न हमारे ...

28. संतुलन ही परमपद

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श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि यदि वह सुख और दु:ख , लाभ और हानि , और जय और पराजय को समान समझकर युद्ध करेगा तो उसे कोई पाप नहीं लगेगा (2.38)। यह एक महत्वपूर्ण श्लोक है और इसमें गीता का पूरा सार है। यह श्लोक बस इतना कहता है कि हमारे सभी कर्म प्रेरित हैं और यही प्रेरणा कर्म को अशुद्ध या पापयुक्त बनाती है। हम शायद ही कोई ऐसा कर्म करते हैं जो सुख , लाभ या जीत पाने के लिए या दु:ख , हानि या हार से बचने के लिए होते हैं। सांख्य और कर्मयोग की दृष्टि से किसी भी कर्म को तीन भागों में बांटा जा सकता है जो कर्ता , कर्म और कर्मफल हैं। श्रीकृष्ण ने कर्मफल को सुख/दु:ख , लाभ/हानि और जय/पराजय में विभाजित किया है। श्रीकृष्ण इस श्लोक में समत्व प्राप्त करने के लिए कर्ता , कर्म और कर्मफल को अलग करने का संकेत दे रहे हैं। एक तरीका यह है कि कर्तापन को छोड़कर साक्षी बन जाएं , इस एहसास से कि जीवन रूपी नाटक में हम एक छोटी सा भूमिका निभाते हैं। दूसरा तरीका यह महसूस करना है कि कर्मफल पर हमारा कोई अधिकार नहीं है क्योंकि यह हमारे प्रयासों के अलावा कई कारकों का एक संयोजन है। कर्तापन या कर्मफल छोड़ने क...

27. सभी धर्मों का त्याग

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श्रीकृष्ण स्वधर्म ( 2.31-2.37) और परधर्म ( 3.35) के बारे में बताते हैं और अंत में सभी धर्मों को त्यागकर परमात्मा के साथ एक होने की सलाह देते हैं ( 18.66) । अर्जुन का विषाद उसके भय से उत्पन्न हुआ कि यदि उसने युद्ध लड़ा और अपने भाइयों को मार डाला तो उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचेगी। श्रीकृष्ण उसे कहते हैं कि युद्ध से पलायन करने पर भी वह अपनी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाएगा क्योंकि युद्ध करना उसका स्वधर्म है ( 2.34-2.36) । समाज यह मानेगा कि अर्जुन युद्ध में उतरने से डर गया और किसी क्षत्रिय के लिए युद्ध से डरना मृत्यु से भी अधिक अपमानजनक है। श्रीकृष्ण आगे बताते हैं कि “ स्वधर्म भले ही दोषपूर्ण या गुणों से रहित हो परन्तु परधर्म से उत्तम है और स्वधर्म के मार्ग में तो मृत्यु भी कल्याणकारक है क्योंकि परधर्म भय देने वाला है ” ( 3.35) । परधर्म सहज और आकर्षक प्रतीत होता है तथा हमारी बहिर्मुखी इन्द्रियों को अधिक अनुकूल लगता है , विशेषकर जब हम सफल लोगों को देखते हैं। सामान्यतः हमारी आत्म-मूल्य की भावना दूसरों के साथ की गई अनुकूल तुलनाओं से पोषित होती है। इसमें वह प्रतिष्ठित परिव...

26. स्वधर्म से समन्वय

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श्रीकृष्ण स्वधर्म ( 2.31-2.37) की व्याख्या करते हैं और वे अर्जुन को बताते हैं कि इस तरह की अनचाही लड़ाई स्वर्ग का द्वार खोलती है ( 2.32) और इससे भागने से स्वधर्म और प्रसिद्धि की हानि होगी और पाप होगा ( 2.33) । युद्ध के मैदान में अर्जुन को दी गई इस सलाह को सही सन्दर्भ में समझने की आवश्यकता है। श्रीकृष्ण वास्तव में स्वधर्म के साथ समन्वय और तालमेल की बात कर रहे हैं , न कि युद्ध के बारे में। श्रीकृष्ण अर्जुन के स्वधर्म और उसके विचारों , वचनों तथा कर्मों के बीच असामंजस्य पाते हैं। वे अर्जुन को इनमें   सामंजस्य लाने का मार्ग दिखाते हैं। अर्जुन के लिए सामंजस्य उसके स्वधर्म के अनुसार युद्ध करने में है जबकि युद्ध से बचने में असामंजस्य है। वास्तव में समन्वय सृष्टि का नियम है जहाँ सबसे छोटे ‘इलेक्ट्रॉन’ , ‘ प्रोटॉन’ और ‘न्यूट्रॉन’ से लेकर सबसे बड़ी आकाशगंगा , ग्रह और तारे सामंजस्य में हैं। हम अपने पसंदीदा संगीत का आनन्द तभी ले पाते हैं जब रेडियो और रेडियो स्टेशन सामंजस्य (धुन) में हों। मानव शरीर से बढ़कर समन्वय का कोई उदाहरण नहीं है। कई अंगों और रसायनों का साथ मिलकर काम करना...