215. खुला रहस्य
भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को ‘ पुरुषोत्तम योग ’ कहा जाता है। यह शीर्षक निम्नलिखित श्लोक से लिया गया है जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं “ मैं नाशवान् कार्य प्रकृति (सृष्टि) से परे हूँ और अविनाशी आत्मा (कूटस्थ) से भी उत्तम हूँ। इसलिए , वेदों और जगत् में मुझे पुरुषोत्तम कहा गया है ” ( 15.18) । एक बार जब जागरूकता स्थापित होने लगती है तो हमारे सामने दो मूलभूत प्रश्न आते हैं: हमें क्या करना चाहिए और हमें क्या जानना चाहिए ? श्रीकृष्ण ने पहले प्रश्न के उत्तर में हमारे सभी कर्मों को उनको अर्पण करके हमें ममत्व रहित और आशारहित रहने को कहा था (3.30)। श्रीकृष्ण दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं “ जो ज्ञानी पुरुष मुझे पुरुषोत्तम के रूप में जानते हैं , वास्तव में वे सब कुछ जानते हैं। वे पूर्ण रूप से मेरी पूजा करते हैं ” (15.19)। हालाँकि यह एक सरल और खुला रहस्य है कि जब जानना अस्तित्वगत स्तर पर होता है तब ‘ सब कुछ जानना ’ सम्भव होता है। श्रीकृष्ण ने हमें हर समय उनका स्मरण करने का निर्देश दिया था और अब वे हमें अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ उनकी आराधना करने के लिए कहते हैं। हर क्षण और अप...