214. कैसे और क्यों
परमात्मा
अनन्त सागर के समान हैं और आत्मा एक
अविनाशी बूंद है जो नाशवान मानव शरीर में स्थित है। श्रीकृष्ण उस सागर का वर्णन
करते हुए कहते हैं, "सूर्य
में स्थित तेज जो सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और
अग्नि में भी है, उसको
तू मेरा ही तेज जान (15.12)। मैं पृथ्वी में
व्याप्त होकर सभी जीवों को अपनी
शक्ति से पोषित करता हूँ। चन्द्रमा के रूप में मैं सभी वनस्पतियों को जीवन रस से पोषित करता हूँ"
(15.13)।
" मैं वैश्वानर (तेज शक्ति) बनकर सभी प्राणियों
के शरीर में स्थित हूँ, प्राण (श्वास) और अपान (प्रश्वास) से युक्त होकर चतुर्विध अन्न
को पचाता हूँ (15.14)। मैं समस्त
प्राणियों के हृदय में स्थित; और
मुझसे ही स्मृति (आत्म-जागरूकता), ज्ञान
और अपोहन (संदेहों का समाधान) उत्पन्न होते हैं। मैं ही समस्त वेदों द्वारा जानने योग्य हूँ, मैं ही वेदान्त का रचयिता और वेदों के अर्थों को जानने
वाला हूँ" (15.15)।
सबसे
पहले,
श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे सूर्य का तेज हैं और सभी जीवों
को ऊर्जा से पोषित करते हैं। पौधे इसे हमारे भोजन में बदल देते हैं। अतीत का सूर्य का प्रकाश ही वह है जिसका उपयोग हम जीवाश्म ईंधन
(fossil fuel) के
रूप में करते हैं। सूर्य का प्रकाश जल को
तरल अवस्था में रखता है। इसलिए, यह हमें जीवित रहने और अस्तित्व में रहने में सक्षम बनाता है।
दूसरे, श्रीकृष्ण ने मानव शरीर
में होने वाली असंख्य प्रक्रियाओं को समझाने के लिए पाचन और श्वास प्रक्रिया को रूपकों
के रूप में चुना। यह किसी शल्यचिकित्सक के चीरे के ठीक होने जैसा है; यह शरीर के विभिन्न अंगों और रसायनों के बीच सामंजस्य है जो
इसे क्रियाशील बनाता है।
विज्ञान
'कैसे' का
उत्तर देने में तो कुशल है, लेकिन 'क्यों' का
नहीं। 'प्रकाश कैसे कार्य करता है' की व्याख्या की गई है, लेकिन 'प्रकाश
द्वैत क्यों है' जैसे प्रश्नों के उत्तर
अनिश्चित छोड़ दिए हैं । इन श्लोकों में श्रीकृष्ण
बताते हैं कि वे ही इन 'क्यों' के
मूल स्रोत हैं। हालाँकि हम 'कैसे
और क्यों'
के निश्चित उत्तर खोजने के लिए संघर्ष करते हैं, लेकिन ये मूलतः उनकी लीला या दिव्य नाटक की अभिव्यक्तियाँ हैं।

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