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Showing posts from April, 2026

213. आत्मा और परमात्मा

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  श्रीकृष्ण विभिन्न संदर्भों में ' सृष्टि ' की व्याख्या करते हैं और संकेत देते हैं कि सम्पूर्ण अस्तित्व प्रकृति और पुरुष का समन्वय है। उनका गर्भ महत्-ब्रह्म (महान् प्रकृति) है जिसमें वे बीज स्थापित करते हैं जो सभी प्राणियों के जन्म का कारण है ( 14.3) । गुण और विकार प्रकृति से उत्पन्न होते हैं ( 13.20) और प्रकृति ही कारण और प्रभाव के लिए भी उत्तरदायी है ; पुरुष सुख और दुःख के द्वन्द्वों का अनुभव करने के लिए उत्तरदायी है ( 13.21) । श्रीकृष्ण आगे विस्तार से बताते हैं और कहते हैं “ सृष्टि में दो प्रकार के पुरुष हैं , क्षर (नाशवान्) और अक्षर (अविनाशी)। नाशवान् वे सभी प्राणी हैं जो भौतिक जगत् में हैं। अविनाशी को कूटस्थ (आत्मा) कहते हैं ( 15.16) । लेकिन एक और शाश्वत सर्वोच्च सत्ता है जिसे परमात्मा कहते हैं। तीनों लोकों में व्याप्त होकर , वे उनका पालन करते हैं ” ( 15.17) । यह शाश्वत परमात्मा ही है जो अविनाशी आत्मा और नाशवान् भौतिक जगत् (प्रकृति) दोनों का पालन करता है। वर्तमान वैज्ञानिक समझ यह है कि आरंभ में केवल शुद्ध ऊर्जा ही थी। समय के साथ कुछ ऊर्जा पदार्थ में परिवर्तित हो गई। य...

212. पुनर्जन्म के नियम

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  श्रीकृष्ण ने जीवन की एक रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि उनका एक अंश देहधारी आत्मा के रूप में प्रकट होता है और इन्द्रियों को आकर्षित करता है जो प्रकृति का हिस्सा हैं। यह संकेत करता है कि इच्छाएँ ही इन्द्रियों को आकर्षित करती हैं। उदाहरण के लिए देखने या सुनने की इच्छा के कारण क्रमशः आँख या कान जैसी इन्द्रियों का विकास हुआ । वे आगे देहधारी आत्मा के शरीर त्यागने और नए शरीर में प्रवेश करने की प्रक्रिया के बारे में बताते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं “ जैसे वायु सुगंध को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है , वैसे ही देहधारी आत्मा मन और इन्द्रियों को (सूक्ष्म शरीर को) अपने साथ ले जाती है , जब वह एक पुराने शरीर को छोड़कर नए शरीर में प्रवेश करती है ( 15.8) । मोहग्रस्त लोग आत्मा को शरीर में निवास करते हुए , शरीर से प्रस्थान करते हुए या इन्द्रियों के द्वारा विषयों का अनुभव करते हुए नहीं देख सकते । केवल ज्ञानचक्षु वाले देख सकते हैं ( 15.10) । मुक्ति के लिए प्रयत्नशील योगी परमात्मा को अपने भीतर विद्यमान देखते हैं ; लेकिन अशुद्ध मन वाले अज्ञानीजन परमात्मा को अनुभव करने में असमर्थ होते हैं , भ...

211. जीवन की रूपरेखा

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  सृष्टि को परमात्मा की लीला या दिव्य नाटक कहा जाता है और यहाँ गंभीरता से लेने जैसा कुछ भी नहीं है। इस दिव्य नाटक में कुछ नियमों का पालन किया जाता है। श्रीकृष्ण इन नियमों की व्याख्या करते हुए कहते हैं “ इस भौतिक संसार की जीवात्माएँ मेरी शाश्वत आत्मा का केवल एक अणु अंश मात्र हैं और पाँच इन्द्रियों और मन को आकर्षित करती हैं , जो प्रकृति का एक हिस्सा हैं (15.7)। श्रवण , दृष्टि , स्पर्श , स्वाद , गंध की ग्राहिका इन्द्रियों तथा मन को अधिष्ठान बनाकर यह जीवात्मा इन्द्रिय विषयों का भोग करता है ” (15.9)। श्रीकृष्ण ने पहले प्रकृति और पुरुष को अनादि कहा था। गुण और विकार प्रकृति से पैदा होते हैं (13.20)। प्रकृति कारण और प्रभाव के लिए जिम्मेदार है ; पुरुष सुख और दुःख के द्वन्द्वों का अनुभव करने के लिए जिम्मेदार है (13.21)। साथ मिलकर ये श्लोक जीवन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। सबसे पहले , परमात्मा का एक अंश प्रत्येक प्राणी के भीतर विद्यमान है जिसे हम आत्मा कहते हैं और इस अर्थ में हम उससे कभी अलग नहीं होते। बस , इन्द्रिय जगत् का अनुभव करते हुए हम भूल जाते हैं कि हम वास्तव में कौन हैं। दूसर...

210. उनके धाम की कुंजियाँ

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  श्रीकृष्ण कहते हैं “ वे जो अभिमान और मोह से मुक्त हो गए हैं , जिन्होंने आसक्ति की बुराइयों पर विजय पा ली है , जो निरन्तर अपनी आत्मा और भगवान् में लीन रहते हैं , जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं और सुख-दुःख के द्वन्द्वों से परे हैं , ऐसे मान और मोह रहित ज्ञानीजन मेरे शाश्वत धाम को प्राप्त करते हैं ” (15.5)। ये उनके धाम में पहुँचने के गुण हैं और यदि एक बार हम इनको प्राप्त कर लेते हैं तो हम उनके धाम में होते हैं। एक और संकेत यह है कि उनका धाम कहीं बाहर नहीं है बल्कि अन्दर ही है जिसे खोजा जाना बाकी है। श्रीकृष्ण ने उन गुणों का वर्णन किया है जो हमें उनके धाम की यात्रा में मार्गदर्शक मील के पत्थरों के रूप में सहायता कर सकते हैं। मैत्रीपूर्ण और दयालु होना ; ममत्व रहित और निरहंकार ; किसी भी प्राणी से द्वेष न रखना ; सुख-दुःख में समभाव रखना (सम-सुख-दुःख) और क्षमाशील होना (क्षमाशील) ; सदैव संतुष्ट और व्याकुलता से मुक्त रहना ; ईर्ष्या , भय और चिंता से मुक्त रहना ; सभी कार्यों में अपेक्षाओं और स्वार्थ से मुक्त रहना ( 12.13 से 12.16); विनम्र और क्षमाशील होना ; इन्द्रिय विषयों के...