213. आत्मा और परमात्मा
श्रीकृष्ण
विभिन्न संदर्भों में 'सृष्टि' की व्याख्या करते हैं और संकेत देते हैं कि सम्पूर्ण अस्तित्व प्रकृति और
पुरुष का समन्वय है। उनका गर्भ महत्-ब्रह्म (महान् प्रकृति) है जिसमें वे बीज स्थापित करते हैं जो सभी प्राणियों के जन्म
का कारण है (14.3)। गुण और विकार प्रकृति से उत्पन्न होते हैं (13.20) और
प्रकृति ही कारण और प्रभाव के लिए भी उत्तरदायी है; पुरुष
सुख और दुःख के द्वन्द्वों का अनुभव करने के लिए उत्तरदायी है (13.21)।
श्रीकृष्ण
आगे विस्तार से बताते हैं और कहते हैं “सृष्टि में दो प्रकार के पुरुष हैं, क्षर (नाशवान्) और अक्षर
(अविनाशी)। नाशवान् वे सभी प्राणी हैं जो भौतिक जगत् में हैं। अविनाशी को कूटस्थ
(आत्मा) कहते हैं (15.16)। लेकिन एक और शाश्वत सर्वोच्च सत्ता है जिसे परमात्मा कहते हैं। तीनों लोकों
में व्याप्त होकर,
वे उनका पालन करते हैं” (15.17)।
यह शाश्वत परमात्मा ही है जो अविनाशी आत्मा और नाशवान्
भौतिक जगत् (प्रकृति) दोनों का पालन करता है।
वर्तमान
वैज्ञानिक समझ यह है कि आरंभ में केवल शुद्ध ऊर्जा ही थी। समय के साथ कुछ ऊर्जा पदार्थ में परिवर्तित हो गई। यह पदार्थ नाशवान् है और कुछ भौतिक
नियमों का पालन करता है जिन्हें श्रीकृष्ण
ने कारण और प्रभाव कहा है। यही पदार्थ जीवों के भौतिक शरीर
बनाता है और इन जीवों को जीवित रहने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। संक्षेप
में, हम अपने आस-पास जो कुछ भी देखते हैं, वह ऊर्जा और पदार्थ का
परस्पर प्रभाव है।
यह
वर्तमान समझ उपरोक्त श्लोकों के अनुरूप है जहाँ श्रीकृष्ण ने कहा कि वह अपने गर्भ (जिसे यहाँ प्रकृति कहा गया है) में
बीज (जिसे यहाँ अविनाशी पुरुष या आत्मा कहा गया है) स्थापित करते हैं और जीवन का आरंभ होता है।
श्रीकृष्ण
एक आयाम और जोड़ते हुए कहते हैं कि वे प्रकृति और पुरुष दोनों से परे हैं फिर भी
उन दोनों का आधार और सहारा हैं। यह स्पष्टता हमें आत्मा और परमात्मा का बोध कराती
है।

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