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Showing posts from March, 2025

172. दैवी विनाश के पश्चात् सृष्टि

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  अर्जुन कहते हैं “ मैं धृतराष्ट्र के सभी पुत्रों को , उनके सहयोगी राजाओं और भीष्म , द्रोणाचार्य , कर्ण तथा हमारे पक्ष के सेना नायकों को आपके विकराल मुख में प्रवेश करता देख रहा हूँ। इनमें से कुछ के सिरों को मैं आपके विकराल दांतों के बीच फंसे हुए और पिसते हुए देख रहा हूँ (11.26 और 11.27)। जैसे प्रचंड नदियाँ समुद्र की ओर बहती हैं , इस संसार के वीर आपके जलते हुए मुखों में प्रवेश कर रहे हैं (11.28)। जिस प्रकार पतंगे तीव्र गति से अग्नि में प्रवेश कर जलकर भस्म हो जाते हैं , उसी प्रकार से ये सेनाएँ अपने विनाश के लिए तीव्र गति से आपके मुख में प्रवेश कर रही हैं (11.29)। आपकी उग्र किरणें दुनिया को झुलसा रही हैं (11.30)। मुझे बताएं कि इतने भयंकर रूप में आप कौन हैं। मैं आपको नमन करता हूँ। मुझ पर दया करें। मैं आपको अर्थात् आदि पुरुष को जानने की इच्छा रखता हूँ। मैं आपका उद्देश्य नहीं जानता ” (11.31)। श्रीकृष्ण कहते हैं “ मैं प्रलय का मूलकारण और महाकाल हूँ और इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। तुम्हारे युद्ध में भाग नहीं लेने पर भी युद्ध की व्यूह रचना में खड़े विरोधी पक्ष क...

171. देवता भी भयभीत हैं

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  अर्जुन कहते हैं “ स्वर्ग के सभी देवताओं के समूह आपकी शरण ग्रहण कर रहे हैं और कुछ भय से हाथ जोड़कर आपकी स्तुति कर रहे हैं (11.21)। रुद्र , आदित्य आदि आपको आश्चर्य से देख रहे हैं (11.22)। आपके कई मुख और आंखें , बहुत सी भुजाएँ , जांघें और पैर , बहुत से पेट , बहुत से भयानक दांतों सहित आपके विकराल रूप को देखकर समस्त लोक भयभीत हैं , और उसी प्रकार से मैं भी भयभीत हूँ (11.23)। आपको आकाश को स्पर्श करते हुए देखकर मेरा हृदय भय से कांप रहा है और मैंने अपना सारा धैर्य और मानसिक संतुलन खो दिया है (11.24)। आपके विकराल दांतों और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्ज्वलित अनेक मुखों को देखकर , मुझे दिशाओं का ज्ञान ही नहीं रहा ” (11.25)। अर्जुन कहते हैं कि देवता भयभीत हैं और समस्त लोक भयग्रस्त है। भय और कृपा की अपेक्षा एक द्वंद्व का जोड़ा बनाते हैं। यानी अपेक्षा के पीछे भय छिपा होता है। परमात्मा , परिवार , मालिक या यहाँ तक कि खुद से भी सहायता की अपेक्षा की जा सकती है। भय तब उत्पन्न होता है जब मन में यह आशंका जन्म लेती है कि सहायता प्राप्त नहीं होगी। जब सहायता की अपेक्षा छोड़ दी जाती है तो भय स्वतः ही...

170. ‘सृजन’ और ‘संहार’

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  आश्चर्यचकित होकर , सिर झुकाकर और हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए अर्जुन बोले “ हे श्रीकृष्ण , मैं आपके शरीर में सभी देवताओं और विभिन्न प्राणियों के समूह को देख रहा हूँ (11.14)। मैं कमल पर विराजित ब्रह्मा को , शिव को , समस्त ऋषियों , और दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ (11.15)। मैं सभी दिशाओं में अनगिनत भुजाएँ , उदर , मुँह और आँखों के साथ आपके सर्वत्र फैले हुए अनंत रूप को देख रहा हूँ। आपके रूप में मुझे न कोई अंत दिखता है , न कोई मध्य और न कोई आदि (11.16)। मैं आपको मुकुट धारण किए हुए , गदा और चक्र से सुसज्जित , सब ओर से प्रकाशमान तेज के पुञ्ज , आपके अनंत स्वरूप को देखता हूँ। आपके तेज की प्रज्वलित अग्नि में , जो सभी दिशाओं में सूर्य के समान चमक रही है , आपको देखना कठिन है ” (11.17)। “ मैं आपको अविनाशी , जानने योग्य परम सत्य के रूप में मानता हूँ। आप समस्त सृष्टि के परम आधार हैं , आप सनातन धर्म के पालक और रक्षक हैं , आप सनातन पुरुष हैं (11.18)। आप आदि , मध्य और अंत से रहित हैं और आपकी शक्तियों का कोई अंत नहीं है। सूर्य और चन्द्रमा आपके नेत्र हैं। आपके मुंह से प्रज्ज्वलित अग्नि निकल रही है और ...

169. दिव्य दृष्टि

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  भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखलाया (11.9) और अर्जुन ने विश्वरूप में असंख्य मुख , असंख्य नेत्र , अनेक अद्भुत दृश्य , दिव्य आभूषणों और सुगंध धारण किये हुए , ऐसे अनेक चमत्कार देखे जो गौरवशाली और असीमित हैं (11.10 और 11.11)। उनकी चमक आकाश में एक साथ उगते हजारों सूर्यों के समान है (11.12)। अर्जुन ने संपूर्ण ब्रह्मांड को परमेश्वर के शरीर में देखा (11.13)। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान की क्योंकि वह विश्वरूप को अपनी आंखों से नहीं देख सकता था (11.8)। विश्वरूप में श्रीकृष्ण के असंख्य , गौरवशाली , बहुरंगी और बहुआकार वाले सैकड़ों और हजारों रूप (11.5) ; आदित्य , वसु और रुद्र ; कई अद्भुत चीजें जो पहले कभी नहीं देखी गईं (11.6) ; चल और अचल समेत संपूर्ण ब्रह्माण्ड शामिल हैं (11.7)। दिव्य दृष्टि को समझने का एक तरीका यह है कि इसे भगवान् द्वारा अर्जुन को दी गई उस विशेष शक्ति के रूप में देखा जाए जिसने उसे विश्वरूप का दर्शन करने में सक्षम बनाया। गहरे स्तर पर , द्वन्द्वों के कारण हम संसार को वैसा नहीं देखते जैसा वह वास्तव में है बल्कि वैसा देखते हैं जैसे हम स्वयं हैं क...

168. अधिकार-भाव का त्याग

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  अर्जुन कहते हैं “ मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गोपनीय आध्यात्मिक विषयों का उपदेश दिया है , उसे सुनकर अब मेरा भ्रम दूर हो गया है (11.1)। मैने आपसे सभी प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय के संबंध में विस्तार से सुना है तथा मैंने आपकी अविनाशी महिमा को भी जाना है (11.2)। आपने मुझे अपने परम विभूतियों के बारे में बताया है , किन्तु मैं इन सारे विभूतियों से युक्त आपके स्वरूप को प्रत्यक्ष देखने का इच्छुक हूँ (11.3)। यदि आप मानते हैं कि मैं आपके परम स्वरूप को देखने में सक्षम हूँ , तो कृपा करके मुझे उस अविनाशी स्वरूप को दिखाएं ” (11.4)। आम धारणा यह है कि भ्रम पर काबू पाने और अध्यात्म प्राप्त करने के लिए परमात्मा का आशीर्वाद जरूरी है। हालाँकि यह तर्कसंगत प्रतीत होता है परन्तु कठिन आंतरिक परिवर्तन से बचने के लिए इसे एक बहाने के रूप में प्रयोग किया जाता है। यदि किसी को कर्मफल की आशा किए बिना कर्म करने के लिए कहा जाए तो वह तर्क देगा कि यह ईश्वर के आशीर्वाद के बिना संभव नहीं है। जब किसी को द्वन्द्वों से परे या गुणों से परे जाने के लिए कहा जाता है ; या विभाजन को छोड़कर अपने चारों ओर के प...