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Showing posts from May, 2023

74. श्रद्धा आनन्द लाती है

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श्रीकृष्ण कहते हैं “ जो कोई मनुष्य दोषदृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं , वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं ” ( 3.31) । ‘ श्रद्धा’ शब्द दो पदों के मेल से बना है -‘श्रत्’ और ‘धा’। ‘श्रत्’ का अर्थ है सत्य तथा ‘धा’ का अर्थ है धारण करना। अर्थात् सत्य को धारण करने का नाम श्रद्धा है। श्रद्धा का अर्थ आमतौर पर विश्वास या आस्था माना जाता है लेकिन श्रद्धा इन दोनों के परे है। इस अवस्था में हम संदेह से मुक्त होते हैं और हमारे सभी प्रश्न समाप्त हो जाते हैं। मानवता लंबे समय तक यह मानती रही कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर घूमता है , जब तक यह ज्ञात नहीं हुआ कि वास्तव में पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। इस प्रकार मानना बाहरी चीजों पर निर्भर है जबकि श्रद्धा एक आंतरिक स्थिति है। विश्वास के साथ उसका विपरीत ध्रुव  -अविश्वास भी मौजूद रहता है , जबकि श्रद्धा दोनों से परे होती है। श्रद्धा उस अंध विश्वास से अलग है जहाँ कोई दूसरे पक्ष की बात सुनने को तैयार नहीं है। श्रद्धा हर चीज का एकत्व में आत्मसात् करना है। जबकि आस्था और विश्वास उधार लिया जा सकता है ...

73. समर्पण की कला

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श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं “ मुझ अन्तर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशारहित , ममतारहित और सन्ताप ( शोक ) रहित होकर युद्ध कर ” ( 3.30) । यह श्लोक गीता का सारांश है और यह दैनिक जीवन में हमारे कई संदेहों का समाधान करता है। हमारा पहला संदेह ‘हमें क्या करना चाहिए’ है जो इसलिए उत्पन्न होता है क्योंकि हम जो कर रहे हैं उससे हम खुश नहीं हैं। हमें लगता है कि खुशी कहीं और किसी दूसरी क्रिया में है। लेकिन यह श्लोक हमारे पास जो काम है उसे उच्चतम क्षमता के साथ करने हेतु प्रेरित करता है जो हमारे द्वारा चुना गया हो या हम पर थोपा गया हो। ऐसा कार्य कुरुक्षेत्र युद्ध जितना ही क्रूर और जटिल हो सकता है जिसमें किसी को मार दिया जाएगा या स्वयं मर जाएगा। वैज्ञानिक रूप से , हमारा जटिल मानव शरीर एकल कोशिका से विकसित हुआ है जहाँ प्रत्येक क्रिया (उत्परिवर्तन) पिछले क्रिया से जुड़ी होती है। इसका मतलब है कि हमारे पास जो काम है वह हमेशा पिछले कर्मों की एक श्रृंखला का परिणाम होता है और कोई कर्म अकेले नहीं होता है। अगला प्रश्न है - ‘ हमें कर्म कैसे ...

72. धारणाओं का बंदी

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  श्रीकृष्ण कहते हैं “ प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं , उन पूर्णतया न समझनेवाले मंदबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जाननेवाला विचलित न करे ” ( 3.29) । वास्तविक कर्ता होने के अलावा गुणों में सम्मोहित करने और हम पर जादू करने की क्षमता होती है जो हमें हमारे वास्तविक स्वरूप को भुला देती है। हम तब तक मंत्रमुग्ध रहते हैं जब तक हमें एहसास नहीं हो जाता कि हम जादू के अधीन हैं। श्रीकृष्ण अज्ञानी और बुद्धिमान् के बारे में बताते हैं। अज्ञानी गुण के मन्त्रमुग्धता या माया के अधीन रहकर यह सोचते हैं कि वे कर्ता हैं ( 3.27) । अज्ञानी व्यक्ति चीजों को प्राप्त करना , महत्वपूर्ण होना , मान्यता प्राप्त करना और अधिकारों के लिए लड़ना चाहते हैं। साथ ही वे परिवार , कार्यस्थल और समाज में दूसरों को कर्ता मानते हैं और उनसे अपेक्षा करते हैं कि वे उनकी अपेक्षाओं के अनुसार व्यवहार करें। जब ऐसा नहीं होता है तो अपराध बोध , खेद , क्रोध और दु:ख से वे पीड़ित हो जाते हैं। जागरूकता का दूसरा चरण यह है कि किसी घटना के घटने के पश्चात् जागरूकता उत्...

71. गुणों की परस्पर प्रक्रिया

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श्रीकृष्ण कहते हैं “ वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं तो भी जिसका अंत:करण अहंकार से मोहित हो रहा है , ऐसा अज्ञानी ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा मानता है ( 3.27) । गुणविभाग और कर्मविभाग के तत्व को जानने वाला ज्ञानयोगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों से बरत रहे हैं , ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता ” ( 3.28) । गीता का मूल उपदेश है कि किसी भी कार्य का कोई कर्ता नहीं होता है बल्कि गुणों के बीच परस्पर प्रक्रिया का नतीजा है। सत्व , रजस् और तमस् ये तीन गुण हममें से प्रत्येक में अलग-अलग अनुपात में मौजूद हैं। सत्वगुण ज्ञान के प्रति लगाव है ; रजोगुण कर्म के प्रति आसक्ति है और तमस् आलस्य की ओर ले जाता है। यह ध्यान देने योग्य है कि कोई भी गुण किसी अन्य गुण से श्रेष्ठ या निम्न नहीं है। वे सिर्फ गुण हैं। उदाहरण के लिए यदि कोई रजोगुण के प्रभाव में है तो वे कार्रवाई के प्रति गहन रूप से प्रवृत्त होकर सो नहीं पाएंगे। जबकि सोने के लिए तमस् गुण की आवश्यकता होती है। हमें उस गुण से अवगत होने की आवश्यकता है जो वर्तमान समय में हम पर हावी है। उदाहरण के लिए तमस् के प्र...

70. समय को अवसर दें

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एक फल विकसित होने और पकने के लिए अपने मूल पेड़ से पोषक तत्वों को अवशोषित करता है। फिर वह अपनी यात्रा शुरू करने के लिए पेड़ से अलग हो जाता है। मूल वृक्ष से मुक्ति की यात्रा की शुरुआत से अंत में स्वयं वृक्ष बनने तक विभिन्न क्रियाएँ शामिल हैं। दूसरी ओर , एक अपरिपक्व फल को मूल वृक्ष से तब तक जुड़ा रहना चाहिए जब तक कि वह पक न जाए यानी अपनी यात्रा स्वयं शुरू करने में वह सक्षम न हो जाय। परन्तु एक पके फल को अपरिपक्व फल को पेड़ छोड़ने का लालच नहीं देना चाहिए क्योंकि यह अभी तक एक स्वतंत्र यात्रा शुरू करने के लिए तैयार नहीं है। यदि यह मूल वृक्ष से सही समय तक आवश्यक पोषण प्राप्त नहीं करता है तो यह नष्ट हो जाएगा। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं “ परमात्मा के स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह शास्त्रविहित कर्मों में आसक्तिवाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात् कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे। किन्तु स्वयं शास्त्रविहित समस्त कर्म भलीभांति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाए ” ( 3.26) । क्योंकि अज्ञानी अस्तित्व द्वारा दिए गए अनुभवों के माध्यम से ही ज्ञान प्राप्त करते ...

69. अभिनेता भी और दर्शक भी

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हमारे दैनिक जीवन में हम कुछ कर्मों और व्यक्तियों से जुड़ जाते हैं , जिन्हें हम पसंद करते हैं , जिसे ‘आसक्ति’ के नाम से वर्णित किया जाता है या हम कुछ कर्मों से नफरत की वजह से दूर हो जाते हैं जिसे ‘विरक्ति’ के नाम से वर्णित किया जाता है परन्तु श्रीकृष्ण एक तीसरी अवस्था का उल्लेख करते हैं जिसे ‘अनासक्ति’ कहते हैं जो आसक्ति और विरक्ति को पार करना है। उनका कहना है कि “ कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते है , अनासक्त विद्वान् भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे ” ( 3.25) । आसक्ति और विरक्ति पर आधारित कर्म हमें दु:खी कर सकते हैं। किसी प्रियजन (आसक्ति) की उपस्थिति हमें खुशी देती है और उनकी अनुपस्थिति हमें दु:खी करती है। इसी प्रकार घृणा करने वाले (विरक्ति) की उपस्थिति हमें दु:खी करती है और उनकी अनुपस्थिति से राहत मिलती है। इसलिए आसक्ति या विरक्ति दोनों हमें सुख और दु:ख की ध्रुवों के बीच झुलाते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण हमें परामर्श देते हैं कि किसी भी कार्य को करते समय , दोनों को पार कर अनासक्त बनें। संसार के कल्याण को करुणा के समान समझा जा सकता है...

68. कथनी और करनी में समानता

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बच्चे दुनिया को समझने , नई बातें , शिष्टाचार , व्यवहार आदि सीखने के लिए अपने माता-पिता की ओर देखते हैं और इसीलिए कहा जाता है कि बच्चे को पालने का सबसे अच्छा तरीका है - कथनी और करनी में समानता का उदाहरण पेश करना। यही निर्भरता जीवन के बाद के चरणों में भी जारी रहती है जहाँ निर्भरता दोस्तों , शिक्षकों , आकाओं आदि पर हो सकती है। इसका तात्पर्य है कि ऐसे लोग भी होंगे जो हमेशा हम पर निर्भर रहते हैं और मार्गदर्शन के लिए हमारी ओर देखते हैं। हम जो कुछ भी करते हैं वह उन्हें प्रभावित करता है। इसी सन्दर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं “ श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है , समस्त मनुष्य-समुदाय उसके अनुसार बरतने लगता है ” ( 3.21) । श्रीकृष्ण आगे बताते हैं “ मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है , तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ ( 3.22) । यदि कदाचित् मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाएगी क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं ( 3.2...

67. सम्बद्ध और असम्बद्ध

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श्रीकृष्ण हमें विश्वास दिलाते हैं कि अनासक्ति से , जो कि आसक्ति और विरक्ति को पार करने की स्थिति है , कर्म करने से व्यक्ति परम अवस्था को प्राप्त करता है ( 3.19) और राजा जनक का उदाहरण देते हैं जिन्होंने केवल कर्म से ही सिद्धि प्राप्त की थी ( 3.20) । श्रीकृष्ण इस बात पर जोर देते हैं कि एक राजा जो राज्य के ऐश्वर्य में निमग्न रहता है और जिसकी कई जिम्मेदारियां होती हैं वह भी अनासक्ति से सभी कार्यों को करते हुए सर्वोच्च प्राप्त कर सकता है। इसका अर्थ यह है कि हम भी इसी तरह हमारी परिस्थितियों के बावजूद सर्वोच्च तक पहुँच सकते हैं। इतिहास में ऐसे बहुत कम उदाहरण होंगे जहाँ दो प्रबुद्ध लोगों ने बातचीत की हो। ऐसी एक बातचीत राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र के बीच है जो अष्टावक्र गीता के नाम से जाना जाता है , जिसे साधकों के लिए सर्वोत्तम में से एक माना जाता है। कहते हैं कि एक बार एक गुरु ने अपने शिष्यों में से एक जो लंगोटी और एक भीख के कटोरे के साथ रहते थे , को अंतिम पाठ के लिए राजा जनक के पास भेजा। वह जनक के पास आता है और सोचता है कि उसके गुरु ने उसे इस राजा के पास क्यों भेजा जो राज्य के ...