74. श्रद्धा आनन्द लाती है
श्रीकृष्ण कहते हैं “ जो कोई मनुष्य दोषदृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं , वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं ” ( 3.31) । ‘ श्रद्धा’ शब्द दो पदों के मेल से बना है -‘श्रत्’ और ‘धा’। ‘श्रत्’ का अर्थ है सत्य तथा ‘धा’ का अर्थ है धारण करना। अर्थात् सत्य को धारण करने का नाम श्रद्धा है। श्रद्धा का अर्थ आमतौर पर विश्वास या आस्था माना जाता है लेकिन श्रद्धा इन दोनों के परे है। इस अवस्था में हम संदेह से मुक्त होते हैं और हमारे सभी प्रश्न समाप्त हो जाते हैं। मानवता लंबे समय तक यह मानती रही कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर घूमता है , जब तक यह ज्ञात नहीं हुआ कि वास्तव में पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। इस प्रकार मानना बाहरी चीजों पर निर्भर है जबकि श्रद्धा एक आंतरिक स्थिति है। विश्वास के साथ उसका विपरीत ध्रुव -अविश्वास भी मौजूद रहता है , जबकि श्रद्धा दोनों से परे होती है। श्रद्धा उस अंध विश्वास से अलग है जहाँ कोई दूसरे पक्ष की बात सुनने को तैयार नहीं है। श्रद्धा हर चीज का एकत्व में आत्मसात् करना है। जबकि आस्था और विश्वास उधार लिया जा सकता है ...