68. कथनी और करनी में समानता
बच्चे
दुनिया को समझने,
नई बातें, शिष्टाचार, व्यवहार आदि सीखने के लिए अपने माता-पिता की ओर देखते हैं और इसीलिए कहा जाता
है कि बच्चे को पालने का सबसे अच्छा तरीका है -कथनी
और करनी में समानता का उदाहरण पेश करना। यही निर्भरता जीवन के बाद के चरणों में भी
जारी रहती है जहाँ निर्भरता दोस्तों, शिक्षकों, आकाओं आदि पर हो सकती है। इसका तात्पर्य है कि ऐसे लोग भी होंगे जो हमेशा हम
पर निर्भर रहते हैं और मार्गदर्शन के लिए हमारी ओर देखते हैं। हम जो कुछ भी करते
हैं वह उन्हें प्रभावित करता है। इसी सन्दर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं “श्रेष्ठ
पुरुष जो-जो आचरण करता है अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ
प्रमाण कर देता है,
समस्त मनुष्य-समुदाय उसके अनुसार बरतने लगता है” (3.21)।
श्रीकृष्ण
आगे बताते हैं “मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य
वस्तु अप्राप्त है,
तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ (3.22)। यदि कदाचित् मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाएगी क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं (3.23)। यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट भ्रष्ट हो जायें और मैं संकरता का
करनेवाला होऊं तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करनेवाला बनूँ” (3.24)।
स्पष्ट
रूप से
श्रीकृष्ण परमात्मा के रूप में हैं जो बाद में अपना
विश्व-रूप दिखाते हैं। वह रचनात्मकता के रूप में भी हैं जिसमें सृजन, रखरखाव और विनाश शामिल है। इन छंदों में श्रीकृष्ण
ने परिणामों के बारे में उल्लेख किया है यदि रचनात्मकता अपना कर्म करना बंद कर
देती है।
उदाहरण
के लिए
जब एक किसान गेहूँ बोता है तो
रचनात्मकता अंकुरित होने के लिए जिम्मेदार होती है। अगर रचनात्मकता रुक जाती है तो बीज बेकार हो जाता है। अंकुरित होने के बाद अगर वह फसल नहीं उगती है तो वह भी भ्रम का कारण है। उगने के बाद अगर यह बीज पैदा
नहीं करता है
तो यह पीढ़ियों को नष्ट कर देगा। इसी प्रकार जब हम भोजन करते हैं तो पाचन शक्ति उसका पाचन सुनिश्चित करती
है। यदि यह पाचन प्रक्रिया कार्य करना बंद कर दे तो
जीवन समाप्त हो जाएगा।
हमारा
जीवन इस ब्रह्माण्ड में निर्मित दृश्य और अदृश्य स्वचालितता पर अधिक निर्भर करता
है और यह पूरी तरह से रचनात्मकता द्वारा लगातार किए गये अथक कार्यों के कारण संभव
है।
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