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Showing posts from June, 2022

5. ज्ञान, कर्म और भक्ति योग

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  गीता अलग-अलग लोगों को उनके दृष्टिकोण के आधार पर भिन्न दिखाई देती है। गीता में तीन अलग-अलग मार्ग बताए गए हैं - कर्मयोग , सांख्ययोग और भक्तियोग। कर्मयोग मन-प्रधान व्यक्तियों के लिए उपयुक्त है , सांख्ययोग बुद्धि-प्रधान व्यक्तियों के लिए और भक्तियोग हृदय-प्रधान व्यक्तियों के लिए उपयुक्त है। आज की दुनिया में अधिकांश लोग मन-केंद्रित श्रेणी में आते हैं। यह इस विश्वास पर आधारित है कि हम जंजीरों से बंधे हुए हैं और स्वयं को मुक्त करने के लिए कड़ी मेहनत करके उन बन्धनों को तोड़ना होगा। इसका मतलब है कि यह कर्म-केंद्रित है। उनके साथ कोई भी बातचीत ‘अब मुझे क्या करना चाहिए’ के साथ खत्म होती है। यह मार्ग हमें निष्काम कर्म अर्थात् प्रेरणा-रहित कर्म की ओर ले जाता है। सांख्ययोग , जिसे ज्ञानयोग के नाम से भी जाना जाता है , जागरूकता या जानने से संबंधित है। इसका प्रारंभिक बिंदु यह विश्वास है कि हम एक अँधेरे कमरे में हैं और इस अँधेरे को दूर करने के लिए हमें एक दीपक जलाने की आवश्यकता है क्योंकि कोई भी प्रयास या संघर्ष उस अँधेरे को दूर नहीं कर सकता। यह मार्ग हमें ‘विकल्परहित जागरूकता’ ...

4. धारणा का जाल

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गीता इस बात पर जोर देती है कि हमें अपनी इन्द्रियों को समझना चाहिए क्योंकि वे हमारे आंतरिक और बाह्य संसार के बीच के सेतु हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं इन्द्रियों और उनके विषयों का संयोग सुख और दुःख जैसे द्वन्द्वों को उत्पन्न करता है। वे अर्जुन को उपदेश देते हैं कि इनका धैर्यपूर्वक सहन करना सीखो क्योंकि ये अनित्य हैं।      वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हमारे मस्तिष्क में लगभग सौ अरब न्यूरॉन (neuron) होते हैं। इनमें से कुछ शरीर के स्वचालित कार्यों को नियंत्रित करने के लिए डी.एन.ए (DNA) द्वारा संयोजित होते हैं जबकि अन्य हमारे जीवनकाल में हमारे द्वारा संयोजित किए जाते हैं। वाहन चलाना सीखने के पहले दिन हम सभी को वाहन चलाना कठिन लगा पर अभ्यास के साथ धीरे-धीरे हमें इसकी आदत हो गई। ऐसा मस्तिष्क द्वारा अप्रयुक्त न्यूरॉन्स के साथ की गई हार्डवायरिंग के कारण होता है जो ड्राइविंग से जुड़ी सभी गतिविधियों का समन्वय करता है। साधारण चलने से लेकर खेलकूद और शल्य चिकित्सा ( surgery ) जैसे जटिल कार्यों तक इस प्रकार की हार्डवायरिंग सभी कौशलों में देखी जाती है। हार्डवायरिंग से नये...

3. वर्तमान में जीना

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  श्रीमद्भगवद्गीता इस बारे में है कि ‘हम कौन हैं’ न कि ‘हमारे पास क्या है’ या ‘हम क्या जानते हैं’। यह सत्य को जानने के साथ-साथ सच्चा होने जैसा है। ऐसा तब होता है जब हम वर्तमान क्षण में अपने अंतरात्मा में केंद्रित होते हैं। अर्जुन की मूल दुविधा इस भय पर आधारित है कि राज्य हेतु अपने मित्रों , संबंधियों और गुरुजनों का वध करने से संसार की दृष्टि में उसकी छवि पर क्या प्रभाव पड़ेगा। यह विचार अत्यन्त तर्कसंगत प्रतीत होता है और यही पहला अवरोध है जिसे पार करना आवश्यक है। स्पष्टता तो तब आती है जब हम गीता का गहन अध्ययन करते हैं। अर्जुन की असली दुविधा भविष्य में अपनी छवि को लेकर है। श्रीकृष्ण कहते हैं हमें कर्म करने का अधिकार है परंतु कर्मफल पर कोई अधिकार नहीं है। ध्यान देने वाली बात यह है कि कर्म वर्तमान क्षण में होता है और कर्मफल भविष्य में प्राप्त होता है। यह दर्शाता है कि वर्तमान क्षण पर हमारा नियंत्रण होता है लेकिन भविष्य पर नहीं। इसीलिए श्रीकृष्ण कहते हैं हमें कर्म करने का अधिकार है परन्तु कर्मफल पर हमारा कोई अधिकार नहीं है। अपनी छवि को लेकर चिंतित अर्जुन की तरह हम भ...

2. मंजिल एक रास्ते अनेक

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‘मंजिल एक , रास्ते अनेक’ कहावत की भाँति गीता में बताए गए सभी मार्ग हमें हमारी अंतरात्मा की शाश्वत अवस्था तक ले जाते हैं। कुछ रास्ते एक-दूसरे के विपरीत प्रतीत होते हैं। वास्तव में यह एक वृत्त की तरह है जहाँ दोनों ओर की यात्रा हमें एक ही मंजिल पर ले जाएगी। श्रीमद्भगवद्गीता समझ के विभिन्न स्तरों पर अलग-अलग रूप में अनुभव की जाती है। गीता में श्रीकृष्ण कभी अर्जुन के स्तर पर आते हैं और कभी वे परमात्मा के रूप में प्रकट होते हैं। यह समझने में कठिनाइयाँ पैदा करता है , खासकर प्रारंभिक अवस्था में , क्योंकि ये दोनों स्तर अलग-अलग प्रतीत होते हैं।         उदाहरण के लिए पिछली सदी की शुरुआत में वैज्ञानिकों को प्रकाश को समझने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। पहले यह सिद्ध हुआ कि प्रकाश एक तरंग है , बाद में यह ज्ञात हुआ कि यह एक कण की तरह भी व्यवहार करता है। दोनों सिद्धांत एक-दूसरे के विरोधाभासी प्रतीत होते हैं। लेकिन प्रकाश विरोधाभासों का एक संयोजन है। जीवन भी ऐसा ही है और गीता को समझते समय इस तथ्य को ध्यान में रखना आवश्यक है। एक और उदाहरण अंधे व्यक...

1. अहंकार से आरम्भ

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  श्रीमद्भगवद्गीता भगवान् श्रीकृष्ण और योद्धा अर्जुन के बीच कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में हुआ सात सौ श्लोकों का एक दिव्य संवाद है। युद्ध प्रारम्भ होने से ठीक पहले अर्जुन को लगा कि इस युद्ध में उसके अनेक मित्र , गुरुजन और संबंधी मारे जाएंगे। उसने निष्कर्ष निकाला कि इसके अनेक हानिकारक और अवांछनीय परिणाम होंगे। अर्जुन युद्धभूमि में स्वयं को और दूसरों को कर्ता के रूप में देख रहा है। वास्तव में इस दृष्टिकोण को अहंकार कहा जाता है जो ‘अहं’ (मैं) और ‘कर्ता’ से मिलकर बना है। यद्यपि हम सभी एक ही परम एकत्व के अंश हैं फिर भी अहंकार निरन्तर यह आभास कराता रहता है कि हम एक-दूसरे से भिन्न हैं। श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुआ सम्पूर्ण वार्तालाप इसी अहंकार के बारे में है , चाहे वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हो। इससे मुक्ति पाने के लिए श्रीकृष्ण अर्जुन को अनेक मार्ग , मील के पत्थर और मापदंड बताते हैं। यदि हम कुरुक्षेत्र युद्ध को एक रूपक के तौर पर लें तो हम सभी अपने दैनिक जीवन में अर्जुन जैसी परिस्थितियों का सामना करते हैं। यह परिवार , कार्यस्थल , स्वास्थ्य , धन , रिश्तों आदि क...