163. समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता
श्रीकृष्ण कहते हैं “ मैं अस्त्रों में वज्र हूँ ; मैं गायों में कामधेनु हूँ ; संतान की उत्पत्ति के हेतु में मैं प्रेम का देवता कामदेव और सर्पो में सर्पराज वासुकि हूँ (10.28)। जलचरों में मैं वरुण हूँ ; शासन करनेवालों में मैं यमराज हूँ (10.29)। मैं दैत्यों में प्रह्लाद हूँ ; मापने वालों में मैं समय हूँ ” (10.30)। पहले श्रीकृष्ण ने कहा था ‘ मैं मृत्यु हूँ ’ और अब वे कहते हैं वे कामदेव भी हैं। इसके लिए गहन मंथन करने की आवश्यकता है। हमें अपनी समझ की सीमाओं को पार करना होगा। चीजों को अच्छे या बुरे के रूप में विभाजन करने की हमारी प्रवृत्ति ही बाधा है। इस विभाजन के कारण हम जन्म को अच्छा और मृत्यु को बुरा मानते हैं। हर प्राणी अपने वंश को बढ़ाना चाहता है। श्रीकृष्ण कहते हैं वह हर प्राणी में मौजूद ‘ इच्छा ’ हैं जो जीवों की उत्पत्ति के लिए जिम्मेदार है। यह बाहर की ओर या दूसरों की ओर बहने वाली ऊर्जा है। जब यह ऊर्जा अन्दर की ओर बहती है तो यह भक्ति के अलावा और कुछ नहीं है। श्रीकृष्ण कहते हैं शासन करने वालों में वे यमराज (मृत्यु के देवता) हैं। मृत्यु आत्मा के स्तर पर शक्तिहीन है लेकिन बाह...