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21. सृजनात्मकता नष्ट नहीं होती

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श्रीकृष्ण कहते हैं ‘ ॐ तत् सत्’ को परम सत्य का त्रिविध प्रतिनिधित्व माना गया है (17.23)। ‘तत्’ की व्याख्या ‘सर्वव्यापी सत्य’ के रूप में भी की जाती है। ‘तत्’ को समझने की खोज में दो तरह के ज्ञानियों ने मानवजाति का मार्गदर्शन किया है। एक सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाता है और दूसरा नकारात्मक दृष्टिकोण। हालाँकि दोनों मार्गों में गंतव्य एक ही होता है , अंतर केवल यात्रा के प्रारंभ बिंदु और हमारे स्वभाव के अनुसार चुने गए मार्ग पर निर्भर करता है। सकारात्मक दृष्टिकोण रखने वाले ‘तत्’ को -जो अविनाशी , शाश्वत , स्थिर और सर्वव्यापी है -‘पूर्ण’ के रूप में वर्णित करते हैं जिसमें कुछ भी जोड़ा नहीं जा सकता। ‘सृजनशीलता’ इसका एक रूपक है। नकारात्मक दृष्टिकोण रखने वाले ‘तत्’ को -जो अविनाशी , शाश्वत , स्थिर और सर्वव्यापी है -‘शून्य’ के रूप में वर्णित करते हैं जिसमें से कुछ भी घटाया नहीं जा सकता। ‘आकाश’ इसका एक रूपक है। गौर करने का विषय है कि ‘सृजनशीलता’ और ‘आकाश’ ( space ) दोनों ही सृजन करने में सक्षम हैं। यह समझना आसान है कि सृजनशीलता सृजन करती है लेकिन ‘ शून्य ’ द्वारा सृजन को समझना कठिन है...