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23. आत्मा अव्यक्त है

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श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि आत्मा अव्यक्त , अकल्पनीय और विकाररहित है। यह आत्मा इस शरीर की बचपन , युवावस्था और वार्धक्य से होकर गुजरती है और उसी प्रकार अन्य शरीर में भी प्रवेश करती है (2.13)। जब यह बात समझ में आ जाती है तो भौतिक शरीर के लिए शोक करने की कोई जरूरत नहीं रहती ( 2.25) । श्रीकृष्ण यह भी कहते हैं कि सभी प्राणी अपने जन्म से पहले अव्यक्त थे , वे अपने जन्म और मृत्यु के बीच प्रकट होते हैं और अपनी मृत्यु के बाद एक बार फिर अव्यक्त हो जाते हैं ( 2.28) । इसे समझाने के लिए कई संस्कृतियाँ समुद्र और लहर का उदाहरण देते हैं। सागर अव्यक्त का प्रतीक है और लहर प्रकट का प्रतीक है। समुद्र में कुछ समय के लिए लहरें उठती हैं और वे अलग-अलग आकृति , आकार , तीव्रता आदि में दिखाई देती हैं। अंत में लहरें वापस उसी समुद्र में विलीन हो जाती हैं जहाँ से वे उठी थीं। हमारी इन्द्रियाँ केवल व्यक्त यानी तरंगों को ही समझने की क्षमता रखती हैं। इसी तरह एक बीज में वृक्ष बनने की क्षमता निहित होती है। बीज में वृक्ष अव्यक्त रूप में उपस्थित रहता है। जब वह अंकुरित होकर बढ़ने लगता है तब व्यक्त रूप ...