83. असत्य सत्य पर पनपता है
यह संसार , सत्य और असत्य दोनों का मिश्रण है। गहराई से देखने पर ज्ञात होता है कि असत्य प्रायः सत्य की ही गलत व्याख्या होता है जो हमारी परिस्थितियों अथवा हमारी इन्द्रियों और मन की सीमाओं के कारण उत्पन्न होती है। उदाहरण के लिए , दर्पण में दिखाई देने वाली हमारी छवि ‘असत्’ या अवास्तविक है क्योंकि उसका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है ; वह पूरी तरह हमारे दर्पण के सामने उपस्थित होने पर निर्भर करती है। इसी प्रकार प्रसिद्ध रस्सी और सांप दृष्टान्त में रस्सी सत्य है और सांप असत्य है जो रस्सी के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकता। किन्तु जब तक यह बोध नहीं होता तब तक हमारे विचार और कर्म उसी असत्य पर आधारित रहते हैं और अनेक बार यह भ्रम समाज में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है। इसी तरह यदि हम किसी भी तकनीकी ज्ञान ( technology) को ‘सत्य’ मानते हैं तो उसका हानिकारक प्रयोग ‘असत्य’ है। लाउडस्पीकर का इस्तेमाल अच्छाई का प्रचार करने या इसके विपरीत भोले-भाले लोगों को हिंसा के लिए उकसाने के लिए भी किया जा सकता है। इसी तरह आज का सोशल मीडिया असत्य बन जाता है जब इसका इस्तेमाल द्वेषपूर्ण ...