100. इन्द्रिय-विषयों के प्रति साक्षीभाव
जीवन एक दोतरफा प्रक्रिया है। हमें विभिन्न उत्तेजनाएँ प्राप्त होती हैं और हम उनका जवाब देते रहते हैं। इस सन्दर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं “ तत्व को जानने वाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ , सुनता हुआ , स्पर्श करता हुआ , सूंघता हुआ , भोजन करता हुआ , गमन करता हुआ , (5.8) सोता हुआ , श्वास लेता हुआ , बोलता हुआ , त्यागता हुआ , ग्रहण करता हुआ तथा आँखों को खोलता हुआ और मूँदता हुआ भी , सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों में बरत रही हैं -इस प्रकार समझकर नि:संदेह ऐसा माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ ” ( 5.9) । इस अस्तित्वगत श्लोक में श्रीकृष्ण सत्य के ज्ञाता के चरम अनुभव का वर्णन कर रहे हैं। जैसा कि हम नियमित रूप से प्रशंसा और अपमान से उत्पन्न होने वाली भावनाओं का अनुभव करते हैं , हम देखते हैं कि प्रशंसा हमें खुद को भुला देती है , जैसे कि कहावत में कौवा अपनी गायन क्षमता के बारे में लोमड़ी से प्रशंसा सुनकर अपने मुँह के अन्दर का माँस गिरा देता है। इसी तरह जब आलोचना की जाती है तो आलोचना की तीव्रता और आलोचक की ताकत के आधार पर हमारी प्रतिक्रिया मौन से लेकर मौखिक या फिर शारीरिक तक भि...