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Showing posts from July, 2025

183. अभ्यास से सिद्धि

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  श्रीकृष्ण सलाह देते हैं “ अपने मन को केवल मुझ पर स्थिर करो और अपनी बुद्धि मुझे समर्पित कर दो। इस प्रकार से तुम सदैव मुझमें स्थित रहोगे। इसमें कोई संदेह नहीं हैं ” (12.8)। हमारा मन लगातार विभाजन करने के लिए अभ्यस्त है। इस प्रवृत्ति ने हमें असुरक्षित स्थितियों की तुरंत पहचान करके खुद को बचाने में मदद की जिससे हमारे जीवित रहने की संभावना बढ़ गई। हमारे आसपास लगातार बदलती परिस्थितियों के बीच मन को स्थिर करना हमारी दैनिक आचरण के विपरीत लगता है। श्रीकृष्ण हमारी कठिनाइयों से पूरी तरह परिचित हैं और कहते हैं “ हे अर्जुन , यदि तुम दृढ़ता से मुझ पर अपना मन स्थिर करने में असमर्थ हो तो अभ्यास योग द्वारा मुझ तक पहुँचने का प्रयास करो ” (12.9)। श्रीकृष्ण ने पहले अभ्यास और वैराग्य द्वारा मन को नियंत्रित करने की सलाह दी थी (6.35) ; और अशांत मन को वश में करने के लिए दृढ़ संकल्प (6.23) के साथ नियमित अभ्यास (6.26) करने के लिए कहा था। उन्होंने सचेत किया कि जिनका मन वश में नहीं है ऐसे व्यक्ति के लिए योग प्राप्त करना कठिन है लेकिन इसे अभ्यास के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है (6.36)। चमत्कार तो...

182. परमात्मा को कर्म अर्पण

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  मस्तिष्क का सेरिब्रम दो हिस्सों में बँटा होता है -दायाँ और बायाँ गोलार्द्ध। मस्तिष्क का दाहिना भाग रचनात्मकता , भावनाओं आदि से संबंधित कार्यों को नियंत्रित करता है जबकि बायाँ भाग विश्लेषणात्मक और तार्किक कार्यों को संचालित करता है और वे दोनों मिलकर काम करते हैं। इसे गीता के सन्दर्भ में देखें तो , दाएं मस्तिष्क से प्रभावित व्यक्ति ‘ भक्ति ’ की ओर आकर्षित होते हैं जबकि बाएं मस्तिष्क से प्रभावित व्यक्ति ज्ञान (सांख्य) की ओर आकर्षित होते हैं। दोनों ही स्थितियों में कर्म करना आवश्यक है। सांख्य उन्मुख व्यक्तियों के लिए श्रीकृष्ण ने पहले कहा था कि कोई भी एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता क्योंकि हम गुणों के प्रभाव से कर्म करने के लिए बाध्य हैं (3.5 और 3.27)। यह शुद्ध ज्ञान है कि गुण ही वास्तविक कर्ता हैं।  भक्ति उन्मुख लोगों के लिए श्रीकृष्ण कहते हैं “ लेकिन जो अपने सभी कर्मों को मुझे समर्पित करते हैं और मुझे परम लक्ष्य समझकर मेरी आराधना करते हैं तथा अनन्य भक्ति भाव से मेरा ध्यान करते हैं , मन को मुझमें स्थिर कर अपनी चेतना को मेरे साथ एकीकृत कर देते हैं ; हे पार्थ! मैं...

181. प्रारंभ बिंदु

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  श्रीकृष्ण कहते हैं “ वे जो अपने मन को मुझमें स्थिर करते हैं और सदैव दृढ़तापूर्वक पूर्ण श्रद्धा के साथ मुझ परमेश्वर की भक्ति में तल्लीन रहते हैं , मैं उन्हें योग में परम सिद्ध मानता हूँ ” (12.2)। हालाँकि यह उत्तर विशेष रूप से अर्जुन के लिए है , यह मोटे तौर पर हम सभी पर लागू होता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि श्रद्धा किसी भी आध्यात्मिक यात्रा की आधारशिला है।  श्रीकृष्ण ने तुरंत स्पष्ट किया कि निराकार या अव्यक्त का मार्ग भी उन तक पहुँचने का एक मार्ग है। इस संदर्भ में वे कहते हैं “ लेकिन जो लोग अपनी इन्द्रियों को निग्रह करके सर्वत्र समभाव से मेरे परम सत्य , निराकार , अविनाशी , निर्वचनीय , अव्यक्त , सर्वव्यापी , अकल्पनीय , अपरिवर्तनीय , शाश्वत और अचल रूप की पूजा करते हैं , वे सभी जीवों के कल्याण में संलग्न रहकर अंततः मुझे ही प्राप्त करते हैं” (12.3-12.4)। वह दोनों मार्गों की तुलना करते हैं और कहते हैं “ जिन लोगों का मन भगवान् के अव्यक्त रूप पर आसक्त होता है उनके लिए भगवान् की अनुभूति का मार्ग अति दुष्कर और कष्टों से भरा होता है। देहधारी जीवों के लिए अव्यक्त रूप की उपासना...

180. साकार या निराकार

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  भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय के अंत में (11.55) श्रीकृष्ण कहते हैं उन्हें केवल भक्ति के माध्यम से ही पाया जा सकता है। इसीलिए भगवद्गीता के बारहवें अध्याय को ‘भक्तियोग’ कहा जाता है। श्रीकृष्ण के विश्वरूप को देखकर अर्जुन भयभीत हो गए और उन्होंने पूछा “ आपके साकार रूप पर दृढ़तापूर्वक निरन्तर समर्पित होने वालों को या आपके अव्यक्त निराकार रूप की आराधना करने वालों में से आप किसे योग में उत्तम मानते हैं ” (12.1) ? संयोगवश , सभी संस्कृतियों की जड़ें इसी प्रश्न में हैं। गीता में तीन व्यापक मार्ग दिये गये हैं। मन - उन्मुख लोगों के लिए कर्म , बुद्धि उन्मुख के लिए सांख्य (ज्ञान) और हृदय - उन्मुख के लिए भक्ति। ये अलग-अलग रास्ते नहीं हैं और उनके बीच बहुत से आदान-प्रदान होते है और यही इस अध्याय में दिखता है। श्रीकृष्ण ने पहले एक पदानुक्रम दिया और कहा कि मन इन्द्रियों से श्रेष्ठ है ; बुद्धि मन से श्रेष्ठ है और बुद्धि से भी श्रेष्ठ आत्मा है (3.42)। श्रीकृष्ण ने यह भी कहा कि उन्हें केवल समर्पण के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है न कि वैदिक अनुष्ठानों या दान के द्वारा (11.53)। इससे यह निष्कर्ष निक...