Posts

Showing posts from July, 2023

85. कर्म, अकर्म और विकर्म

Image
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं “ कर्म क्या है ? अकर्म क्या है ? इस बात का निर्णय करने में बुद्धिमान् पुरुष भी भ्रमित हो जाते हैं। अब उस कर्मतत्त्व को मैं तुम्हें भलीभाँति समझाऊँगा , जिसे समझकर तुम कर्मबंधन से मुक्त हो जाओगे (4.16)। कर्तव्य कर्म के स्वरूप को समझना अत्यन्त कठिन है। इसी तरह विकर्म (निषिद्ध कर्म या पाप) और अकर्म का स्वरूप भी समझना आवश्यक है (4.17)। जो पुरुष कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है , वही मनुष्यों में बुद्धिमान् है और सब प्रकार के कर्म करते हुए भी वह योगी है और अपने समस्त कर्मों का स्वामी है ” (4.18)। एक चिंतनशील व्यक्ति ने एक बार एक पशु को जंगल की ओर भागते हुए देखा। कुछ ही क्षणों बाद एक कसाई वहाँ आया और उससे पूछा कि क्या उसने उस पशु को देखा है। वह व्यक्ति धर्मसंकट में पड़ जाता है क्योंकि सत्य बोलने पर उस पशु की मृत्यु निश्चित है जबकि असत्य कहना अनैतिक माना जाता है। यदि सभी संस्कृतियों और धर्मों द्वारा निषिद्ध सभी कर्मों को एकत्र कर लिया जाए तो जीवन जीना ही असम्भव हो जाएगा। इसी कारण श्रीकृष्ण संकेत करते हैं कि ये विषय अत्यन्त जटिल हैं और इनम...

84. मुमुक्षुओं के तरीके

Image
  श्रीकृष्ण कहते हैं “ कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है इसलिए मुझे कर्म लिप्त नहीं करते हैं। इस प्रकार जो मुझे तत्व से जान लेता है , वह भी कर्मों से नहीं बँधता ” ( 4.14) । यह श्रीकृष्ण के शब्दों को पुष्ट करता है कि कर्मों पर हमारा अधिकार है लेकिन कर्मफल पर नहीं ( 2.47) । परमात्मा के रूप में श्रीकृष्ण भगवान् भी उसी का अनुसरण करते हैं और हमें बताते हैं कि वह कर्ता नहीं है भले ही उन्होंने मनुष्यों के बीच गुणों और कर्मों के आधार पर विभिन्न विभाजनों का निर्माण किया जो कि कर्तापन की अनुपस्थिति का संकेत देता है ( 4.13) । उन्होंने आगे कहा “ पूर्वकाल में मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जान कर ही कर्म किये हैं। इसलिए तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किये जाने वाले कर्मों को ही कर ” ( 4.15) । अपने जीवन के सामान्य क्रम में हम वांछित कर्मफल प्राप्त करने के लिए कर्म करते हैं परंतु जब हमें कर्मफल का त्याग करने के लिए कहा जाता है तो हम कर्मों का भी त्याग करने की प्रवृत्ति अपना लेते हैं। श्रीकृष्ण यहाँ त्याग की एक बिल्कुल भिन्न अवधारणा प्रकट करते हैं। उनका उपदेश है कि हम ...

83. असत्य सत्य पर पनपता है

Image
  यह संसार , सत्य और असत्य दोनों का मिश्रण है। गहराई से देखने पर ज्ञात होता है कि असत्य प्रायः सत्य की ही गलत व्याख्या होता है जो हमारी परिस्थितियों अथवा हमारी इन्द्रियों और मन की सीमाओं के कारण उत्पन्न होती है। उदाहरण के लिए , दर्पण में दिखाई देने वाली हमारी छवि ‘असत्’ या अवास्तविक है क्योंकि उसका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है ; वह पूरी तरह हमारे दर्पण के सामने उपस्थित होने पर निर्भर करती है। इसी प्रकार प्रसिद्ध रस्सी और सांप दृष्टान्त में रस्सी सत्य है और सांप असत्य है जो रस्सी के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकता। किन्तु जब तक यह बोध नहीं होता तब तक हमारे विचार और कर्म उसी असत्य पर आधारित रहते हैं और अनेक बार यह भ्रम समाज में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है। इसी तरह यदि हम किसी भी तकनीकी ज्ञान ( technology) को ‘सत्य’ मानते हैं तो उसका हानिकारक प्रयोग ‘असत्य’ है। लाउडस्पीकर का इस्तेमाल अच्छाई का प्रचार करने या इसके विपरीत भोले-भाले लोगों को हिंसा के लिए उकसाने के लिए भी किया जा सकता है। इसी तरह आज का सोशल मीडिया असत्य बन जाता है जब इसका इस्तेमाल द्वेषपूर्ण ...

82. जैसी करनी वैसी भरनी

Image
  श्रीकृष्ण सर्वशक्तिशाली अव्यक्त और प्रकट के बीच संबंधों में अंतर्दृष्टि देते हुए कहते हैं “ जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं , मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं ” ( 4.11) । जिस प्रकार हम सभी अपनी परिस्थितियों और जीवन-शैली की भिन्नताओं के बावजूद जीवन भर पृथ्वी पर रहते हैं , उसी प्रकार जीवन के विविध मार्ग अंततः उसी एक आधारभूत सत्य की ओर ले जाते हैं। सबसे पहले यह भगवान् की ओर से एक आश्वासन है कि हम किसी भी मार्ग का अनुसरण करते हैं और भले ही ये मार्ग कितने ही भिन्न हों , वे सभी अव्यक्त परमात्मा के मार्ग हैं। भगवान् एक बहुआयामी दर्पण की तरह प्रतिक्रिया करते हैं जो हमारी भावनाओं , विचारों और कार्यों को प्रतिबिम्बित और प्रतिध्वनित करते हैं। जब हम एक बीज बोते हैं तो उसे एक पेड़ की पूर्ण क्षमता प्राप्त करने में समय लगता है और यह समय अंतराल हमें परमात्मा के प्रतिध्वनि के इस सिद्धांत को पूरी तरह से समझने से रोकता है। अगर हम अपने जीवन को बिना शर्त प्यार और श्रद्धा से भर देते हैं तो प्यार और श्रद्धा अनिवार्...

81. दिव्य कर्म

Image
  गीता में अर्जुन और श्रीकृष्ण दोनों ‘मैं’ और ‘मुझे’ शब्दों का प्रयोग करते हैं किन्तु उनके अर्थ और प्रयोग का संदर्भ भिन्न है। अर्जुन का ‘मैं’ विभाजनकारी अथवा सीमित है जबकि श्रीकृष्ण का ‘मैं’ समावेशी है। श्रीकृष्ण उस असीम महासागर के समान हैं और हम उसकी बूँदें हैं जो अहंकार के कारण स्वयं को उससे अलग मान लेती हैं। जब बूँद अपनी अलग अस्तित्व के भ्रम को त्यागकर महासागर में मिल जाती है तब वह स्वयं महासागर बन जाती है। श्रीकृष्ण इसी ओर संकेत करते हुए कहते हैं “ जो मेरे दिव्य जन्म और कर्मों को तत्त्वतः जान लेते हैं , वे पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होकर मुझे प्राप्त होते हैं” (4.9)। निस्संदेह , आत्मबोध का अर्थ है समावेशिता , एकत्व तथा विरोधाभासों को एक समान मानने की क्षमता। जब सभी कर्म समावेशी चेतना से उत्पन्न होते हैं तब वे स्वतः ही दिव्य बन जाते हैं। पुनर्जन्म का सामान्य अर्थ मृत्यु के बाद पुनः नया जीवन प्राप्त करने की चक्रीय प्रक्रिया के रूप में किया जाता है। किन्तु इसे हमारे आसपास उत्पन्न होने वाली नई परिस्थितियों के जन्म के रूप में भी समझा जा सकता है। जब कोई परिस्थिति...

80. धर्म की रक्षा

Image
जिस प्रकार पहिये को घूमने के लिए एक स्थिर या अपरिवर्तनशील चाक की आवश्यकता होती है , उसी तरह निरन्तर बदलते भौतिक संसार को अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए शांत और परिवर्तनहीन अव्यक्त अस्तित्व की आवश्यकता होती है। अर्जुन , हमारी तरह प्रकट मानव शरीर के स्तर पर है और अपने रिश्तेदारों की मृत्यु की चिंता कर रहा है। भगवान् श्रीकृष्ण जो उस समय मानव रूप में थे , बताते हैं कि कभी-कभी अव्यक्त को प्रकट रूप धारण करने की आवश्यकता क्यों और कैसे होती है। वे कहते हैं “ मैं अजन्मा , शाश्वत और सभी प्राणियों का स्वामी हूँ। अपनी प्रकृति को अधीन करते हुए , मैं अपनी योग - माया से अवतार लेता हूँ ” ( 4.6) । माया के माध्यम से , जो केवल एक विचार है , अव्यक्त प्रकट होता है , जैसा कि परमात्मा करते हैं। अंतर केवल चेतना , इच्छाओं एवं करुणा के स्तर पर है। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “ जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है , तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात् साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ ( 4.7) । साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिये , पापकर्म करनेवालों का विनाश करने के लिय...