85. कर्म, अकर्म और विकर्म
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं “ कर्म क्या है ? अकर्म क्या है ? इस बात का निर्णय करने में बुद्धिमान् पुरुष भी भ्रमित हो जाते हैं। अब उस कर्मतत्त्व को मैं तुम्हें भलीभाँति समझाऊँगा , जिसे समझकर तुम कर्मबंधन से मुक्त हो जाओगे (4.16)। कर्तव्य कर्म के स्वरूप को समझना अत्यन्त कठिन है। इसी तरह विकर्म (निषिद्ध कर्म या पाप) और अकर्म का स्वरूप भी समझना आवश्यक है (4.17)। जो पुरुष कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है , वही मनुष्यों में बुद्धिमान् है और सब प्रकार के कर्म करते हुए भी वह योगी है और अपने समस्त कर्मों का स्वामी है ” (4.18)। एक चिंतनशील व्यक्ति ने एक बार एक पशु को जंगल की ओर भागते हुए देखा। कुछ ही क्षणों बाद एक कसाई वहाँ आया और उससे पूछा कि क्या उसने उस पशु को देखा है। वह व्यक्ति धर्मसंकट में पड़ जाता है क्योंकि सत्य बोलने पर उस पशु की मृत्यु निश्चित है जबकि असत्य कहना अनैतिक माना जाता है। यदि सभी संस्कृतियों और धर्मों द्वारा निषिद्ध सभी कर्मों को एकत्र कर लिया जाए तो जीवन जीना ही असम्भव हो जाएगा। इसी कारण श्रीकृष्ण संकेत करते हैं कि ये विषय अत्यन्त जटिल हैं और इनम...