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Showing posts from September, 2022

25. गुलाब कमल नहीं बन सकता

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श्रीकृष्ण स्वधर्म (अपने स्वभाव अथवा दृष्टिकोण) के विषय में बताते हैं (2.31–2.37) और अर्जुन को सलाह देते हैं कि क्षत्रिय होने के कारण उसे युद्ध करने में संकोच नहीं करना चाहिए क्योंकि वही उसका स्वधर्म है (2.31)। धर्म अथवा सत्य एक है और विराट है। हमारी सीमित इन्द्रियों के लिए उसे पूर्णतः समझ पाना कठिन है। हम उसे विभिन्न प्रकार से अनुभव करते हैं , ठीक वैसे ही जैसे प्रसिद्ध कथा के अंधे व्यक्ति एक ही हाथी को स्पर्श के आधार पर अलग-अलग रूप में अनुभव करते हैं। यदि कोई उसे दाँत के रूप में अनुभव करता है तो वही उसकी वास्तविकता अथवा स्वधर्म बन जाता है। आधुनिक संदर्भ में इसे पैराडाइम ( paradigm) अथवा दृष्टिकोण ( frame of reference) कहा जाता है। स्वधर्म का पालन करने का अर्थ है सत्य की अपनी अनुभूति के प्रति निष्ठावान बने रहना - जैसे वह व्यक्ति जो हाथी को दाँत के रूप में अनुभव करता है - न कि किसी अन्य के आकर्षक दृष्टिकोण (परधर्म) को अपनाना जो उसे पैर या पूँछ के रूप में देखता है। योद्धा होना अर्जुन का स्वधर्म है और वह एक क्षण में कुछ और नहीं बन सकता। ‘क्षत्रिय ‘क्षत’ , ‘ त्र’ एवं ...

24. आत्मा पुराने शरीर को बदलती है

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श्रीकृष्ण कहते हैं आत्मा न मरती है और न मारी जाती है और अज्ञानी ही अन्यथा सोचते हैं। यह अजन्मा , नित्य (अविनाशी) , सनातन और पुरातन है। श्रीकृष्ण यह भी कहते हैं कि जिस प्रकार हम नए वस्त्र पहनने के लिए पुराने वस्त्रों को छोड़ देते हैं , ठीक उसी प्रकार आत्मा भौतिक शरीरों को बदल देती है ( 2.19, 2.20) । वैज्ञानिक सन्दर्भ में इसे ‘ ऊर्जा संरक्षण ’ के नियम एवं द्रव्यमान और ऊर्जा की अंतर-परिवर्तनीयता के सिद्धांत द्वारा अच्छी तरह से समझाया जा सकता है। यदि ऊर्जा को आत्मा का प्रतीक माना जाता है तो भगवान् श्रीकृष्ण के वचन बिल्कुल स्पष्ट हो जाते हैं। ऊर्जा के संरक्षण का नियम कहता है कि ऊर्जा को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता है बल्कि केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए थर्मल पावर स्टेशन थर्मल ऊर्जा को बिजली में परिवर्तित करते हैं। एक बल्ब बिजली को प्रकाश में बदलता है। यह सिर्फ रूपांतरण है , कोई विनाश नहीं है। एक बल्ब का एक सीमित जीवनकाल होता है। जब यह फ्यूज हो जाता है तो इसे एक नए बल्ब से बदल दिया जाता है लेकिन बिजली बनी रहती है। यह उसी तरह है जैसे ...

23. आत्मा अव्यक्त है

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श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि आत्मा अव्यक्त , अकल्पनीय और विकाररहित है। यह आत्मा इस शरीर की बचपन , युवावस्था और वार्धक्य से होकर गुजरती है और उसी प्रकार अन्य शरीर में भी प्रवेश करती है (2.13)। जब यह बात समझ में आ जाती है तो भौतिक शरीर के लिए शोक करने की कोई जरूरत नहीं रहती ( 2.25) । श्रीकृष्ण यह भी कहते हैं कि सभी प्राणी अपने जन्म से पहले अव्यक्त थे , वे अपने जन्म और मृत्यु के बीच प्रकट होते हैं और अपनी मृत्यु के बाद एक बार फिर अव्यक्त हो जाते हैं ( 2.28) । इसे समझाने के लिए कई संस्कृतियाँ समुद्र और लहर का उदाहरण देते हैं। सागर अव्यक्त का प्रतीक है और लहर प्रकट का प्रतीक है। समुद्र में कुछ समय के लिए लहरें उठती हैं और वे अलग-अलग आकृति , आकार , तीव्रता आदि में दिखाई देती हैं। अंत में लहरें वापस उसी समुद्र में विलीन हो जाती हैं जहाँ से वे उठी थीं। हमारी इन्द्रियाँ केवल व्यक्त यानी तरंगों को ही समझने की क्षमता रखती हैं। इसी तरह एक बीज में वृक्ष बनने की क्षमता निहित होती है। बीज में वृक्ष अव्यक्त रूप में उपस्थित रहता है। जब वह अंकुरित होकर बढ़ने लगता है तब व्यक्त रूप ...

22. संतुलन परमानंद है

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गीता के आरंभ में श्रीकृष्ण कहते हैं इन्द्रियों का बाह्य विषयों से मिलन सुख और दु:ख का कारण बनता है ( 2.14) । वे अर्जुन से उन्हें सहन करने के लिए कहते हैं क्योंकि वे अनित्य हैं। समकालीन दुनिया में इसे ‘यह भी बीत जाएगा’ के रूप में जाना जाता है। यदि यह अनुभवात्मक स्तर पर विकसित किया जाता है तो हम इन ध्रुवों को पार कर सकते हैं और उन्हें समान रूप से स्वीकार करने की क्षमता विकसित कर सकते हैं। पाँच इन्द्रिय विषय होते हैं -रूप , रस , गंध , स्पर्श और शब्द। इनके सम्बंधित इन्द्रियाँ आँख , जीभ , नाक , त्वचा और कान हैं। इन्द्रिय-ज्ञान दो भागों के मेल से होता है -एक भौतिक अंग और दूसरा उसका नियंत्रक भाग। नियंत्रक भाग मस्तिष्क के वे भाग हैं जो संबंधित भौतिक अंगों से आने वाले संवेदनात्मक संकेतों को संसाधित करते हैं। किन्तु इन इन्द्रियों यानी भौतिक अंगों की सीमाएँ होती हैं। उदाहरण के लिए आँख का गोलक केवल प्रकाश की एक सीमित आवृत्ति (frequency) को देख सकता है जिसे दृश्यमान प्रकाश कहते हैं। यह प्रति सेकंड 15 से अधिक चित्रों को नहीं देख सकती , जो वीडियो और फिल्मों के निर्माण का आधार है औ...

21. सृजनात्मकता नष्ट नहीं होती

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श्रीकृष्ण कहते हैं ‘ ॐ तत् सत्’ को परम सत्य का त्रिविध प्रतिनिधित्व माना गया है (17.23)। ‘तत्’ की व्याख्या ‘सर्वव्यापी सत्य’ के रूप में भी की जाती है। ‘तत्’ को समझने की खोज में दो तरह के ज्ञानियों ने मानवजाति का मार्गदर्शन किया है। एक सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाता है और दूसरा नकारात्मक दृष्टिकोण। हालाँकि दोनों मार्गों में गंतव्य एक ही होता है , अंतर केवल यात्रा के प्रारंभ बिंदु और हमारे स्वभाव के अनुसार चुने गए मार्ग पर निर्भर करता है। सकारात्मक दृष्टिकोण रखने वाले ‘तत्’ को -जो अविनाशी , शाश्वत , स्थिर और सर्वव्यापी है -‘पूर्ण’ के रूप में वर्णित करते हैं जिसमें कुछ भी जोड़ा नहीं जा सकता। ‘सृजनशीलता’ इसका एक रूपक है। नकारात्मक दृष्टिकोण रखने वाले ‘तत्’ को -जो अविनाशी , शाश्वत , स्थिर और सर्वव्यापी है -‘शून्य’ के रूप में वर्णित करते हैं जिसमें से कुछ भी घटाया नहीं जा सकता। ‘आकाश’ इसका एक रूपक है। गौर करने का विषय है कि ‘सृजनशीलता’ और ‘आकाश’ ( space ) दोनों ही सृजन करने में सक्षम हैं। यह समझना आसान है कि सृजनशीलता सृजन करती है लेकिन ‘ शून्य ’ द्वारा सृजन को समझना कठिन है...

20. मृत्यु हमें नहीं मारती

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श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं “ ऐसा कोई समय नहीं था कि जब मैं नहीं था या तुम नहीं थे और ये सभी राजा न रहे हों और ऐसा भी नहीं है कि भविष्य में हम सब नहीं रहेंगे ” (2.12)। वे आगे कहते हैं कि अविनाशी , शाश्वत ‘जीवात्मा’ (अव्यक्त) का ‘भौतिक पक्ष’ अथवा उसका प्रकट रूप नश्वर है और निश्चित रूप से नष्ट होगा। इसलिए युद्ध को इन नश्वर देहों की चिंता किए बिना लड़ा जाना चाहिए। इस शाश्वत ‘जीवात्मा’ को आत्मा , चैतन्य आदि अनेक नामों से जाना जाता है। श्रीकृष्ण इसे ‘देही’ कहते हैं। श्रीकृष्ण सृष्टि के मूल तत्व से आरम्भ करते हैं। वे ‘जीवात्मा’ की बात करते हैं जो अविनाशी , अथाह , सर्वव्यापी और नित्य है (2.20 एवं 2.21)। दूसरे , इसी नित्य (आत्मा) तत्त्व का एक भौतिक (शरीर) पक्ष भी है जो निश्चित रूप से नष्ट होता है (2.18)। इसलिए जब श्रीकृष्ण युद्धभूमि पर उपस्थित राजाओं का उल्लेख करते हैं तो वे उनके नश्वर शरीर की नहीं बल्कि उनमें विद्यमान उस नित्य जीवात्मा की बात कर रहे हैं जो अविनाशी और शाश्वत है। हम दो भागों से बने हैं। पहला भाग ‘ शरीर और मन ’ है जो अवश्य ही नष्ट हो जाता है। ये सुख और द...

19. सृजनात्मकता सृजन करती है

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श्रीकृष्ण कहते हैं ‘ सत् ’ जो कि वास्तविक और स्थायी है , कभी समाप्त नहीं होता है। असत्य अस्थायी है , जिसका कोई अस्तित्व नहीं है। श्रीकृष्ण हमें ‘ उस ’ पर चिंतन करने के लिए कहते हैं जो अविनाशी है और जो सभी में व्याप्त है ( 2.17) । सृष्टि के बारे में प्रचलित और सरल समझ यह है कि यह किसी सृष्टिकर्ता की रचना है। लेकिन श्रीकृष्ण सृजनात्मकता की ओर इशारा करते हैं जो एक निरन्तर विकासोन्मुख शक्ति है। उदाहरण के लिए यह बीज से अंकुरण का कारण बनता है। अंकुर और बीज (दोनों रचनाएँ) नष्ट हो सकते हैं लेकिन सृजनात्मकता नहीं। यह अथक रूप से काम करती है और चारों ओर व्याप्त है। जबकि सृष्टि समय से बंधी है , सृजनात्मकता समय से परे है। सृष्टि जन्म लेती है और मृत्यु के बाद समाप्त हो जाती है जबकि सृजनात्मकता शाश्वत है। सृजनात्मकता वास्तविक कर्ता है क्योंकि यह सृष्टि की रचना करता है। यह अनुभूति और भावनाएँ पैदा करता है। यह हमारे शरीर और मन जैसे भौतिक रूपों को बनाता है। ज्ञान और स्मृति सदैव अतीत की होती है और कर्मफल ( सृजन ) भविष्य में होता है। सृजनात्मकता हमेशा वर्तमान में होती है। हमारी इन...

18. ‘सत्य’ एवं ‘असत्य'

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श्रीकृष्ण कहते हैं ‘सत्’ जो कि वास्तविकता और स्थायित्व है , कभी समाप्त नहीं होता है। ‘असत्’ जो अस्थायी है , का कोई अस्तित्व नहीं है। ज्ञानी वह है जो दोनों के बीच अंतर कर सके ( 2.16) । ‘सत्’ और ‘असत्’ की जटिलता को समझने के लिए कई संस्कृतियों में रस्सी और सांप की कहानी को प्रायः उद्धृत किया जाता है। एक आदमी शाम को घर वापस पहुँचा और पाया कि उसके घर के प्रवेश द्वार पर एक सांप कुंडली मारे बैठा है। लेकिन वास्तव में यह बच्चों द्वारा छोड़ी गई रस्सी थी जो हल्के अंधेरे में सांप की तरह दिख रही थी। यहाँ रस्सी सत् और सांप असत् का प्रतीक है। जब तक उसे सत् यानी रस्सी का बोध नहीं हो जाता तब तक वह असत् यानी कल्पित सांप से निपटने के लिए कई रणनीतियाँ अपना सकता है। वह उस पर डंडे से हमला कर सकता है या भाग सकता है या उसकी वास्तविकता परखने के लिए दिया जला सकता है। जब हमारी धारणा असत् की होती है तो सर्वोत्तम रणनीतियाँ और कौशल व्यर्थ हो जाते हैं। एक अन्य उदाहरण दर्पण में दिखाई देने वाला प्रतिबिंब है। जब हम दर्पण के सामने खड़े होते हैं तो उसमें हमारी छवि दिखाई देती है। यह प्रतिबिंब हमारे बिना...