20. मृत्यु हमें नहीं मारती
श्रीकृष्ण
अर्जुन से कहते हैं
“ऐसा कोई समय नहीं था कि जब मैं नहीं था या तुम नहीं थे और ये
सभी राजा न रहे हों और ऐसा भी नहीं है कि भविष्य में हम सब नहीं रहेंगे” (2.12)। वे आगे कहते हैं कि अविनाशी, शाश्वत ‘जीवात्मा’ (अव्यक्त) का ‘भौतिक पक्ष’ अथवा उसका प्रकट रूप नश्वर है और
निश्चित रूप से नष्ट होगा। इसलिए युद्ध को इन नश्वर देहों की चिंता किए बिना लड़ा जाना
चाहिए। इस शाश्वत ‘जीवात्मा’ को आत्मा, चैतन्य आदि अनेक नामों से जाना
जाता है। श्रीकृष्ण इसे ‘देही’ कहते हैं।
श्रीकृष्ण
सृष्टि के मूल तत्व से आरम्भ करते हैं। वे ‘जीवात्मा’ की बात करते हैं जो अविनाशी,
अथाह, सर्वव्यापी और नित्य है (2.20 एवं
2.21)। दूसरे,
इसी नित्य (आत्मा) तत्त्व का एक भौतिक (शरीर) पक्ष भी है जो निश्चित रूप से नष्ट होता है (2.18)। इसलिए जब श्रीकृष्ण युद्धभूमि पर उपस्थित
राजाओं का उल्लेख करते हैं तो वे उनके नश्वर शरीर की नहीं बल्कि उनमें विद्यमान उस नित्य जीवात्मा की बात कर रहे हैं जो अविनाशी और शाश्वत है।
हम
दो भागों से बने हैं। पहला भाग ‘शरीर और मन’ है
जो अवश्य ही नष्ट हो जाता है। ये सुख और दुःख के ध्रुवों के
अधीन होते हैं;
और अर्जुन उसी दुःख के ध्रुव का अनुभव कर रहा है। दूसरा भाग
है देही (आत्मा), जो शाश्वत है। श्रीकृष्ण का जोर इस बात को समझकर शरीर (असत्) से अपनी पहचान छोड़कर
देही (सत्) से अपनी पहचान बनाने पर है। बुद्धत्व (ज्ञानोदय) वह है जब शरीर से पहचान
स्वयं ही समाप्त हो जाती है जो एक अनुभव है और जिसे शब्दों
में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
गीता
का वह भाग जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध करने के लिए कहते हैं, समझने में सबसे कठिन है। कुछ लोग कहते हैं कि कुरुक्षेत्र का युद्ध कभी हुआ ही
नहीं और यह हमारे प्रतिदिन के संघर्षों का एक रूपक मात्र है। अगर अर्जुन पीछे हट भी
जाता
तो भी युद्ध जारी रहता। श्रीकृष्ण जानते हैं कि अहंकार के कारण युद्ध से पीछे हटने पर भी अर्जुन हमेशा निराशा का गुलाम बना रहेगा। इसलिए श्रीकृष्ण उसे ‘सत्’ का बोध करने और जागरूकता के साथ युद्ध लड़ने के लिए कहते हैं।
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