161. आदि, मध्य और अंत
योगशक्ति
और महिमाओं का विस्तार से वर्णन करने के अर्जुन के अनुरोध के उत्तर में श्रीकृष्ण कहते हैं “अब मैं तुम्हें अपनी दिव्य
महिमाओं का संक्षेप में वर्णन करूंगा, क्योंकि
उनके विस्तार का कोई अंत नहीं है”
(10.19)। अर्जुन के अनुरोध को स्वीकार करते हुए श्रीकृष्ण
उसे बताते हैं कि उनकी दिव्य महिमा का कोई अंत नहीं है। ध्यान देने वाली बात यह है
कि इस विशाल अस्तित्व का वर्णन करना संभव नहीं है क्योंकि यह अनंत है और समय के
साथ लगातार विकसित और परिवर्तित होता रहता है।
सारे
संसार में श्रीकृष्ण अव्यक्त रूप में व्याप्त हैं (9.4) जिस कारण ब्रह्माण्ड
संतुलित है। संपूर्ण ब्रह्माण्ड उनसे इस प्रकार पिरोया हुआ है जैसे कि एक धागे में
मणि (7.7)। जीवित प्राणियों का उल्लेख करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं “मैं सभी प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ। मैं उनका आदि, मध्य और अंत भी हूँ”
(10.20)।
हमारे
अन्दर प्रभु का देवत्व आत्मा के रूप में है लेकिन हमें इसे
स्वयं में और दूसरों में पहचानना मुश्किल लगता है। इसके अलावा यह देवत्व सृजनात्मक
के रूप में प्रत्येक प्राणी के सृजन, उन्नति
और विनाश के लिए जिम्मेदार है।
हमारी
इन्द्रियाँ बाहरी दुनिया में भिन्नताओं को देखने के लिए विकसित हुई हैं। यह क्षमता
हमारे जीवित रहने के लिए उपयोगी है क्योंकि यह असुरक्षित स्थितियों को पहचानकर
हमें अपनी सुरक्षा करने में मदद करती है। एक सीमा से परे यह
क्षमता एक बैसाखी बन जाती है और हमें देवत्व की अनुभूति करने से रोकती है।
दूसरी
कठिनाई यह है कि देवत्व जो अव्यक्त है, व्यक्त
संसार से ढकी रहती है। हमारी इन्द्रियाँ व्यक्त को पहचानने में सक्षम हैं लेकिन
अव्यक्त देवत्व को पहचानने से चूक जाती हैं।
श्रीकृष्ण
कहते हैं वह सभी प्राणियों के आदि, मध्य और अंत हैं। इसने ‘त्रिमूर्ति’
की धारणा को जन्म दिया -सृजन के लिए ब्रह्मा जिसके लिए
ज्ञान की आवश्यकता होती है; उन्नति और संरक्षण के लिए
विष्णु जिसके लिए संसाधनों की आवश्यकता होती है; विनाश के लिए शिव जिसके लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इस प्रकार से, देने वाले और लेने वाले भी वही हैं।

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