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Showing posts from December, 2022

41. ‘तटस्थ’ रहना

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  हमारा जीवन अपने कार्यों और निर्णयों के साथ-साथ दूसरों के कार्यों को भी ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ के रूप में विभाजित करने का अभ्यस्त है। श्रीकृष्ण कहते हैं समबुद्धि युक्त पुरुष अच्छे और बुरे दोनों कर्मों का त्याग कर देता है (2.50)। इसका अर्थ है कि जब हम समत्व योग अर्थात् मध्य में स्थित होने की अवस्था को प्राप्त करते हैं तब विभाजन/वर्गीकरण समाप्त हो जाते हैं। तब हम वस्तुओं को अपने निजी निर्णयों के बिना जैसे वे हैं वैसे ही देख पाते हैं। नैतिक उपदेश हमें बुरे कर्मों से बचने और अच्छे कर्मों को अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं जो आध्यात्मिक यात्रा के प्रारम्भिक चरणों में निस्संदेह सहायक होता है। किन्तु श्रीकृष्ण संकेत करते हैं कि समबुद्धि युक्त पुरुष अच्छे और बुरे दोनों कर्मों का त्याग कर देता है। अच्छे कर्म भी सूक्ष्म रूप से अहंकार को बढ़ाते हैं क्योंकि व्यक्ति स्वयं को बुरे कर्म करने वालों से श्रेष्ठ समझने लगता है। आध्यात्मिक पथ के आगे के चरणों में यह श्रेष्ठता का बोध बहुत बड़ी बाधा बन सकता है। अतः वास्तविक ध्यान उस विभाजक मन को समझने और उससे ऊपर उठने पर होना चाहिए जो निरन्तर कर्मों को अ...

40. आंतरिक यात्रा के लिए सुसंगत बुद्धि

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हमारे भीतरी और बाहरी हिस्सों का मिलन ही योग है। इसे ‘ कर्मयोग ’ , ‘ भक्तियोग’ , ‘ सांख्ययोग’ , ‘ बुद्धियोग’ जैसे कई मार्गों से प्राप्त किया जा सकता है। व्यक्ति अपनी प्रकृति के आधार पर उसके अनुकूल मार्गों से योग प्राप्त कर सकता है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि “ इस समत्वरूप बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणी का है। इसलिए तू समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूंढ अर्थात् बुद्धियोग का ही आश्रय ग्रहण कर क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दीन हैं ” ( 2.49) । इससे पहले श्रीकृष्ण ने कहा कि “ कर्मयोग में बुद्धि सुसंगत है और जो अस्थिर हैं उनकी बुद्धि बहुत भेदों वाली होती है ” ( 2.41) । एक बार जब बुद्धि सुसंगत हो जाती है तब वह आध्यात्मिक यात्रा करने में सक्षम हो जाती है , जो अन्यथा कठिन है। प्रत्येक यात्रा में दिशा और गति दोनों का होना आवश्यक है। श्रीकृष्ण का बुद्धियोग का सन्दर्भ अंतरात्मा की शाश्वत अवस्था की ओर यात्रा की दिशा के बारे में है। सामान्यतः हम अपनी सुसंगत बुद्धि का उपयोग भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए करते हैं। यह श्लोक संकेत देता है कि हमें उसी सुसंगत...

39. कर्तापन की भावना को छोड़ना

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  श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं , तू आसक्ति / संङ्ग को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि वाला होकर योग में स्थित होकर कर्तव्य कर्मों को कर। यह समत्व ही योग कहलाता है (2.48) । इसका अर्थ है , जब हम इन द्वन्द्वों के साथ अपनी पहचान करना बंद कर देते हैं तो हम जो कुछ भी करते हैं वह सामंजस्यपूर्ण होगा। हमारा दैनिक जीवन अनेक निर्णयों और विकल्पों को चुनने से भरा होता है। हमारा सतत निर्णय लेने वाला मन उपलब्ध विकल्पों में से ऐसा चयन करता रहता है जिससे सुख/विजय/सफलता अधिकतम हो और दुःख/हानि/पराजय न हो (2.38)। समत्व द्वन्द्वों को समान मानने की क्षमता है जिसे सामान्यतः द्वन्द्वों को पार करना कहा जाता है। जब यह अनुभूति गहराई से उतरती है तो मन शक्तिहीन हो जाता है और विकल्प रहित जागरूकता प्राप्त करता है। हम सोते समय , नशे में या औषधि के प्रभाव में भी इस विकल्प रहित अवस्था का अनुभव कर सकते हैं लेकिन वास्तविक समत्व वह है जब हम निर्णय लेने में सक्षम होते हुए भी निर्णय किए बिना स्थिति का अवलोकन कर पाते हैं। यह साक्षीभाव से वर्तमान क्षण में जागरूक रहने की अवस्था है। कर्म करते समय सम...

38. दोहराव महारत की कुंजी है

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    हम अपने जीवन में बहुत कुछ सीखते हैं , ज्ञान और अनुभव अर्जित करते हैं। लेकिन महत्वपूर्ण निर्णायक क्षणों में हम जागरूकता के आधार पर नहीं बल्कि अपनी प्रवृत्तियों के अनुसार व्यवहार करते हैं क्योंकि हमारी जागरूकता की गहराई आवश्यक स्तर से कम होती है। श्रीकृष्ण इसे भलीभांति जानते हैं और गीता में बार-बार विभिन्न दृष्टिकोणों से वास्तविकता के बारे में समझाते हैं ताकि यह जागरूकता और गहरी हो और आवश्यक स्तर को पार कर सके। गीता इस बात पर बल देती है कि हमारा एक शाश्वत आंतरिक स्वरूप है और एक बाह्य प्रकट स्वरूप है। हम स्वभावतः अपने बाह्य स्वरूप के साथ अपनी पहचान बनाने के अभ्यस्त होते हैं जिसमें भौतिक शरीर , हमारी भावनाएँ , विचार तथा हमारे चारों ओर की दुनिया सम्मिलित होती है। श्रीकृष्ण हमें सत्य को जानकर अपने उस आंतरिक स्वरूप से पहचान स्थापित करने का उपदेश देते हैं जो समस्त जीवों में व्याप्त है , शाश्वत है और अपरिवर्तनीय है। इन जटिलताओं को समझने के लिए बहती हुई नदी उचित उदाहरण है। इसके दो तट होते हैं और दोनों नदी के तल में मिल जाते हैं। जहाँ दोनों तट नदी के सहज प्रवाह के लिए आवश्यक है...

37. क्रिया और प्रतिक्रिया

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  श्रीकृष्ण कहते हैं हमें कर्म करने का अधिकार है लेकिन कर्मफल पर हमारा कोई अधिकार नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम अकर्म की ओर झुक जाएँ , जो निष्क्रियता या परिस्थितियों की प्रतिक्रिया मात्र हैं। एक तरह से यह श्लोक जागरूकता और करुणा की बात करता है -जागरूकता इस सत्य का बोध है कि कर्म और कर्मफल अलग-अलग हैं तथा करुणा वह दृष्टि है जो दूसरों के साथ-साथ स्वयं के प्रति भी समान सद्भाव रखती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कर्म किए बिना हमारा जीवित रहना असम्भव है क्योंकि भौतिक शरीर के रखरखाव के लिए खाने आदि जैसे कर्मों की आवश्यकता होती है ( 3.8) । सत्व , रज , तमो गुण हमें लगातार कर्म की ओर ले जाते हैं (3.5)। इसलिए अकर्म के लिए शायद ही कोई जगह है। यह ‘प्रतिक्रिया’ को दर्शाता है। उदाहरण के लिए यदि हम समाचार पढ़ते , सुनते या देखते समय अपनी प्रवृत्तियों का अवलोकन करें तो हमें पता चलता है कि हमारे भीतर अनेक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न हो रही हैं। ऐसा तब होता है जब धर्म , जाति , राष्ट्रीयता , विचारधारा आदि जैसे हमारे विश्वासों के पक्ष या विपक्ष में हम कुछ देखते , सुनते या पढ़ते हैं। यही स्थिति परिवार और कार...

36. वही अर्जुन वही बाण

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  ‘ वही अर्जुन वही बाण’ एक मुहावरा है। इसका प्रयोग प्रायः ऐसी स्थिति का वर्णन करने के लिए किया जाता है जब एक सफल या सक्षम व्यक्ति काम पूरा करने में विफल रहता है। एक योद्धा के रूप में अर्जुन कभी युद्ध नहीं हारे। अपने जीवन के उत्तरार्ध में वह एक छोटी सी लड़ाई हार गए जिसमें उन्हें परिवार के कुछ सदस्यों को डाकुओं के समूह से बचाना था। वह इस स्थिति को अपने भाई को बताते हुए कहते हैं “ मुझे नहीं पता कि क्या हुआ। मैं वही अर्जुन हूँ और ये वही बाण थे जिन्होंने कुरुक्षेत्र का युद्ध जीता था लेकिन इस बार मेरे बाणों को न तो अपना लक्ष्य मिला और न ही उनमें शक्ति थी ” । उन्होंने बताया कि उन्हें भागना पड़ा और परिवार की रक्षा नहीं कर सके। जीवन के अनुभव हमें बताते हैं कि ऐसा हममें से किसी के साथ भी हो सकता है। कई बार प्रतिभाशाली खिलाड़ी कुछ समय के लिए अपनी क्षमता (form) खो देते हैं ; एक अभिनेता या गायक असफल हो जाता है। इसका दोष भाग्य , बुरे समय आदि को दिया जाता है और निश्चित रूप से कोई नहीं जानता कि ऐसा क्यों होता है। अनुमानों और शंकाओं को छोड़कर इसके लिए शायद ही कोई वैज्ञानिक व्याख्या है। इस सन...