36. वही अर्जुन वही बाण
‘वही अर्जुन वही
बाण’
एक मुहावरा है। इसका प्रयोग प्रायः ऐसी स्थिति का वर्णन
करने के लिए किया जाता है जब एक सफल या सक्षम व्यक्ति काम पूरा करने में विफल रहता
है।
एक
योद्धा के रूप में अर्जुन कभी युद्ध नहीं हारे। अपने जीवन के उत्तरार्ध में वह एक छोटी सी लड़ाई हार गए जिसमें उन्हें परिवार के कुछ सदस्यों को डाकुओं के
समूह से बचाना था। वह इस स्थिति को अपने भाई को बताते हुए कहते हैं “मुझे नहीं पता कि क्या हुआ। मैं वही अर्जुन हूँ और ये वही बाण थे जिन्होंने
कुरुक्षेत्र का युद्ध जीता था लेकिन इस बार मेरे बाणों
को न तो अपना लक्ष्य मिला और न ही उनमें शक्ति थी”।
उन्होंने बताया कि उन्हें भागना पड़ा और परिवार की रक्षा नहीं कर सके।
जीवन
के अनुभव हमें बताते हैं कि ऐसा हममें से किसी के साथ भी हो सकता है। कई बार प्रतिभाशाली खिलाड़ी कुछ समय के लिए अपनी क्षमता (form)
खो देते हैं; एक अभिनेता या गायक असफल हो जाता है। इसका दोष भाग्य, बुरे समय आदि को दिया जाता
है और निश्चित रूप से कोई नहीं जानता कि ऐसा क्यों होता है। अनुमानों और शंकाओं को
छोड़कर इसके लिए शायद ही कोई वैज्ञानिक व्याख्या है।
इस
सन्दर्भ में
कर्म और कर्मफल के बीच संबंध के बारे में बताते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं ‘दैवम्’ कर्म की पूर्ति
में योगदान करने वाले कारकों में से एक है (18.14)।
दैवम् एक प्रकार की ईश्वरीय शक्ति है और प्रकट विश्व दृष्टिकोण से अज्ञात है। यही
कारण है कि श्रीकृष्ण कहते हैं कर्म पर तुम्हारा अधिकार है, कर्मफल पर नहीं।
हस्तरेखा विज्ञान, ज्योतिष और राशिफल जैसी विद्याओं का अभ्यास किया जाता है
लेकिन उनमें से कोई भी दैवम् नहीं है। इसी प्रकार दैवम् को निर्धारित
करने के लिए कोई वैज्ञानिक सिद्धांत उपलब्ध नहीं है।
श्रीकृष्ण
कहते हैं हम केवल निमित्त-मात्र हैं अर्थात् सर्वशक्तिमान्
की महान् योजना में एक छोटा सा माध्यम (11.33)। निमित्त-मात्र की अवस्था प्राप्त करने की कुंजी यह है कि सफलता से अहंकार न उत्पन्न
हो
ताकि असफलता हमें चोट न पहुँचाए। क्योंकि ‘दैवम्’ जीवन में सफलता
और असफलता,
दोनों में भूमिका निभाता है।

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