198. हवा में महल
श्रीकृष्ण कहते हैं “ जितने भी चर और अचर सृष्टि तुम्हें दिखाई दे रही हैं वे सब क्षेत्र और क्षेत्र के ज्ञाता का संयोग मात्र हैं (13.27)। जो परमात्मा को सभी जीवों में आत्मा के रूप में देखता है और जो इस नश्वर शरीर में दोनों को अविनाशी समझता है केवल वही वास्तव में देखता है ” (13.28)। इसी तरह का वर्णन श्रीकृष्ण ने पहले भी किया था जहाँ उन्होंने ‘ सत् ’ को शाश्वत और ‘ असत् ’ को वह बताया जो अतीत में नहीं था और जो भविष्य में भी नहीं होगा (2.16) ; और हमें उनमें अंतर करने की सलाह दी। हम अपने चारों ओर जो कुछ भी देखते हैं वह नाशवान् है। श्रीकृष्ण कहते हैं इस नाशवान् के पीछे अविनाशी है। नश्वरता की गहराई में जाकर अविनाशी की खोज करने के बजाय हम अपना जीवन नाशवान् के आधार पर बनाते हैं। यह हवा में महल बनाने जैसा है। नाशवान् में स्थायित्व या निश्चितता लाने के हमारे प्रयासों का अंत दुःख में होना तय है। श्रीकृष्ण ने ऐसी स्थिति को अपने द्वारा अपना विनाश के रूप में वर्णित किया और परम गंतव्य तक पहुँचने के लिए भगवान् की सर्वव्यापकता का एहसास करने का परामर्श दिया (13.29)। यह बिना आसक्ति या विरक्ति के नाश...