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Showing posts from September, 2026

224. नरक के तीन द्वार

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  एक नैतिक शिक्षा की कक्षा में शिक्षक सत्य बोलने और बड़ों का आदर करने का पाठ पढ़ाते हैं। अगले दिन सभी छात्र उस पाठ को याद कर लेते हैं और कक्षा में दोहराते हैं किंतु एक छात्र कहता है कि वह पाठ याद नहीं कर पाया और शिक्षक उस छात्र पर क्रोधित हो जाते हैं क्योंकि वह पाठ सरल था। छात्र बताता है कि उसने पिछले दिन अपने भाई को बड़ों के क्रोध से बचाने के लिए झूठ बोला था। यह कहानी ‘ जानने ’ और ‘ होने ’ के बीच के अंतर को दर्शाती है। निम्नलिखित श्लोक ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं जिन्हें समझना तो बहुत सरल है परंतु जब हम इन्हें पढ़ते हैं तो इन्हें आत्मसात् करना कठिन होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं “ काम , क्रोध और लोभ जीवात्मा को आत्म विनाश के नरक की ओर ले जाने वाले तीन द्वार हैं। इसलिए मनुष्य को इन तीनों का त्याग करना चाहिए (16.21)। जो अंधकार रूपी इन तीनों द्वारों से मुक्त होते हैं , वे अपनी आत्मा के कल्याण के लिए चेष्टा करते हैं और इस प्रकार से परम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं ” (16.22)। किसी वस्तु या विषय को समझने के लिए उसके विपरीत को समझना भी आवश्यक है -जैसे दिन और रात। कई मौकों पर श्रीकृष्ण ने अ...

223. बुराई का फल बुरा ही होता है

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  श्रीकृष्ण आसुरी प्रवृत्ति वालों का विस्तार से वर्णन करते हुए कहते हैं “ ऐसे अनेक प्रकार से भ्रमित मन वाले , मोह के जाल में उलझकर तथा विषय-भोगों में आसक्त होकर घोर नरक में गिरते हैं (16.16)। ऐसे अभिमानी और हठी लोग , संपत्ति के मद और अहंकार से मदमस्त होकर , शास्त्रों के विधि-विधानों का आदर न करते हुए पाखंडपूर्वक केवल नाम मात्र के लिए यज्ञ करते हैं (16.17)। अहंकार (मैं कर्ता हूँ) , बल , दम्भ , कामना और क्रोध से अंधे होकर , ये द्वेषी पुरुष अपने भीतर तथा अन्य सभी प्राणियों में निवास करने वाले मुझ अन्तर्यामी को तुच्छ समझते हैं (16.18)। इन द्वेष करनेवाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में डालता हूँ (16.19)। ये अज्ञानी आत्माएँ आसुरी योनियों में बार-बार जन्म लेती हैं। हे अर्जुन , वे मूढ़ मुझे प्राप्त न कर पाने पर , धीरे-धीरे आसुरी योनियों को और उससे भी अति अधम गति को ही प्राप्त होते हैं ” (16.20)। श्रीकृष्ण ने पहले कहा था कि वे सभी जीवों के प्रति समान भाव रखते हैं। उनके लिए न तो कोई द्वेष्य है और न ही कोई प्रिय है (9.29)। उपरोक्त श्लोक संकेत कर...

222. शक्ति का अहंकार

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  श्रीकृष्ण कहते हैं आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति सोचता है “मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस इच्छा को पूरा करूँगा। यह सब मेरा है और कल मुझे इससे भी अधिक मिलेगा (16.13)। मैंने इस शत्रु को मार डाला है और अन्य शत्रुओं को भी मार डालूँगा। मैं मनुष्यों में शासक हूँ ; मैं भोगी हूँ , मैं पूर्ण शक्तिशाली और सुखी हूँ ( 16.14) । मैं धनवान और कुलीन हूँ ; मेरे समान और कौन है ? मैं त्याग करूँगा , मैं दान करूँगा , मैं आनन्द मनाऊँगा ”, इस प्रकार आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति अज्ञानता से मोहित हो जाते हैं ( 16.15) । ​​ आज की दुनिया में इसे ' सफलता ' समझ लिया जाता है। यह अहंकार की भाषा है जो दूसरों से तुलना करने से पनपती है। आसुरी व्यक्ति अहंकार से ग्रसित होता है जो दूसरों की तुलना में अधिक धन अर्जित करने में सफलता मिलने पर , शत्रुओं के परास्त होने पर , या उन्नति के शिखर पर पहुँचने पर शासक जैसा अनुभव करता है। ऐसा होने पर अहंकार में वृद्धि होती है। तुलना इच्छाओं को प्रेरित करती है जिसमें संचय और इन्द्रिय तृप्ति की इच्छा भी शामिल हैं। लेकिन इन्द्रिय तृप्ति का कोई अंत नहीं है और श्...