58. विषाद से ज्ञानोदय तक
श्रीकृष्ण कहते हैं “ जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं वैसे ही समस्त इच्छाएँ (कामनाएँ) जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किये बिना ही समा जाते हैं , वही पुरुष परम शांति को प्राप्त होता है , भोगों को चाहने वाला नहीं ” ( 2.70) । वे आगे कहते हैं “ जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्यागकर ममतारहित , अहंकाररहित और स्पृहा रहित हुआ विचरता है , वही शांति को प्राप्त होता है ( 2.71) । यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है , इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थिर होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाता है ” ( 2.72) । श्रीकृष्ण इस शाश्वत अवस्था (मोक्ष-परम स्वतंत्रता और आनन्द) की तुलना करने के लिए समुद्र का उदाहरण देते हैं और नदियाँ इन्द्रियों द्वारा लगातार प्राप्त होने वाली उत्तेजनाएँ हैं। सागर की तरह निश्चल स्थिति प्राप्त करने के बाद मनुष्य स्थिर रहता है , भले ही प्रलोभन और इच्छाएँ उनमें प्रवेश करती रहें। दूसरे , जब नदियाँ समुद्र से मिल...