78. इन्द्रियों को वश में करना
इच्छाओं से भरे तुलसीदास अपनी नवविवाहित पत्नी से मिलने के लिए बेताब थे। वह एक लाश को लकड़ी का लट्ठा समझकर रात में नदी पार कर गए ; दीवार पर चढ़ने के लिए एक सांप को रस्सी के रूप में इस्तेमाल किया , केवल पत्नी से फटकार सुनने के लिए कि जितना प्रेम हाड़ माँस से बने मेरे इस शरीर से है , यदि उतना प्रेम श्रीराम के नाम से होता तो आप कब के इस जीवन रूपी नैया को पार लगा चुके होते। वे उसी क्षण परिवर्तित हो गए और वे श्रद्धेय ‘राम चरित मानस’ के लेखक बन गए। तुलसीदास की कहानी हमें इन्द्रियों को वश में करके इच्छा को नाश करने के लिए श्रीकृष्ण की सलाह को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती है ( 3.41) । इच्छा के दो पहलू होते हैं। पहला -दृढ़ संकल्प की ऊर्जा , जो हमारे अन्दर पैदा होते हैं। दूसरा है उसकी दिशा। जब यह ऊर्जा बाहर की तरफ बहती है , यह कामुक सुख और संपत्ति की तलाश में नष्ट हो जाती है। जब श्रीकृष्ण हमें इच्छाओं को नष्ट करने के लिए कहते हैं तो वे नहीं चाहते कि हम इस ऊर्जा को नष्ट कर दें बल्कि यह चाहते हैं कि हम इसे तुलसीदास की तरह अन्दर की ओर निर्देशित करें। यह ऊर्जा साहसिक आध्यात्...