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Showing posts from October, 2025

192. ‘वह’ हैं भी और नहीं भी

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  श्रीकृष्ण ‘तत्’ शब्द का प्रयोग करते हैं जिसका अनुवाद सामान्यतः ‘वह’ के रूप में किया जाता है। ‘ तत्’ की व्याख्या ‘सर्वव्यापी सत्य’ के रूप में भी की जाती है। वे कहते हैं कि ‘ ॐ तत् सत् ’ - ये तीन शब्द परम सत्य , ब्रह्म का त्रिविध प्रतिनिधित्व माने गए हैं ( 17.23) । जब हम परमात्मा का स्मरण या उपासना करते हैं तब भी हम अलग बने रहते हैं। क्योंकि उपासक और उपास्य के रूप में एक द्वैत बना रहता है। इस भेद को समाप्त कर एकत्व की अवस्था को व्यक्त करने के लिए ही ‘तत्’ -अर्थात् ‘वह’ -शब्द का प्रयोग किया गया है। श्रीकृष्ण कहते हैं “ मैं ‘तत्’ (वह) का वर्णन करूँगा जो जाननेयोग्य है जिसे जानकर मनुष्य अमरत्व को प्राप्त करता है। वह परम ब्रह्म जो अनादि है , उसे न सत् कहा जाता है और न असत् ही (13.13)। वह सब ओर हाथ-पैर वाला , सब ओर नेत्र , सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है ; क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है (13.14)। वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है , परंतु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी...

191. आध्यात्मिक होना

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  ज्ञान के बारे में अर्जुन के अनुरोध के जवाब में श्रीकृष्ण कहते हैं “ विनम्रता , दम्भहीनता , अहिंसा , क्षमा , मन-वाणी आदि की सरलता , गुरु की सेवा , पवित्रता , दृढ़ता , आत्मसंयम (13.8) ; इन्द्रिय विषयों के प्रति वैराग्य , अहंकार रहित होना , जन्म , रोग , बुढ़ापा और मृत्यु के दोषों की अनुभूति (13.9) ; अनासक्ति , सन्तान , स्त्री , घर या धन आदि वस्तुओं की ममता से मुक्ति , प्रिय और अप्रिय प्राप्ति में सदा ही शाश्वत समभाव , ज्ञान है ” (13.10)। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “ मेरे प्रति निरन्तर अनन्य भक्ति , एकान्त स्थानों पर रहने की इच्छा , लौकिक समुदाय के प्रति विमुखता (13.11) ; आध्यात्मिक ज्ञान में स्थिरता और परम सत्य की तात्त्विक खोज , इन सबको मैं ज्ञान घोषित करता हूँ और जो भी इसके विपरीत है वह अज्ञान है” (13.12)। इनमें से कुछ स्वयं के बारे में हैं और बाकी बाहरी दुनिया के साथ हमारे संबंधों के बारे में हैं। ‘ मेरे जैसा कोई नहीं ’ की मनोदशा से ग्रसित कोई भी व्यक्ति विनम्रता को कमजोरी मानने लगता है। लेकिन श्रीकृष्ण विनम्रता को ज्ञान का प्रारंभिक बिंदु मानते हैं। विनम्रता न तो कमजोरी है और न ह...

190. क्षेत्र की विशेषताएं

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  श्रीकृष्ण भौतिक शरीर को क्षेत्र के रूप में संदर्भित करते हैं और इसकी विशेषताएँ और इसके कारण और प्रभाव (विकार) के बारे संक्षेप में बताते हैं ; तथा क्षेत्रज्ञ (क्षेत्र का ज्ञाता) और उनकी शक्तियों के बारे में भी बताते हैं। वह आगाह करते हैं कि इनका वर्णन विभिन्न ऋषियों द्वारा और कई आध्यात्मिक ग्रंथों में कई तरह से किया गया है (13.4 और 13.5)। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का वर्णन विभिन्न ऋषियों और ग्रंथों द्वारा अलग-अलग तरीकों से किया गया है। यह एक गम्भीर समस्या है जहाँ सत्य का वर्णन अलग-अलग लोगों द्वारा अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग तरीकों से किया गया है जिस कारण से हमें समझने में कठिनाई आती है। श्रीकृष्ण शब्दों के मायाजाल में न खोने के लिए कहते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं “ पाँच महाभूत , अहंकार , बुद्धि और मूल प्रकृति , दस इन्द्रियाँ और मन , इन्द्रियों के पाँच विषय (13.6) ; इच्छा , घृणा , सुख , दुःख , स्थूल देह का पिंड , चेतना , ये सब इनके विकारों के सहित क्षेत्र कहा गया है ” (13.7)। पाँच महाभूत में , अग्नि (ऊर्जा) ; पदार्थ की तीन अवस्थाएँ -पृथ्वी (ठोस) , जल (तरल)...

189. क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ

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  भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय को ‘ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग ’ ( क्षेत्र और क्षेत्र के ज्ञाता के बीच अंतर के माध्यम से योग) कहा जाता है। अर्जुन के प्रश्न से अध्याय शुरू होता है “ मैं यह जानने का इच्छुक हूँ कि प्रकृति क्या है और पुरुष क्या है तथा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ क्या है ? मैं यह भी जानना चाहता हूँ कि सच्चा ज्ञान क्या है और जानने योग्य (ज्ञेय) क्या है ” ( 13.1) ? श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं “ इस शरीर को क्षेत्र कहा जाता है और इस क्षेत्र को जानने वाला क्षेत्रज्ञ है ” (13.2)। क्षेत्र एक वैज्ञानिक शब्द है और उस अर्थ में यह अध्याय एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी प्रस्तुत करता है। श्रीकृष्ण ने विभिन्न लक्षणों के बारे में बताया जो उन्हें प्रिय हैं (12.13-12.20)। इनमें घृणा , उत्तेजना , कामनाएँ , आकांक्षाएँ , ईर्ष्या , भय और चिंता को छोड़ना ; स्तुति और निंदा ; मान-अपमान ; सुख और दुःख को समान मानकर समत्व प्राप्त करना ; मित्र और शत्रु के प्रति समान होना ; संतुष्ट रहना , किसी भी चीज के प्रति आसक्त न होना , श्रद्धावान् , अहंकार से मुक्त और क्षमाशील होना , शामिल हैं। स्वाभाविक प्रश्न हैं -नक...