26. स्वधर्म से समन्वय
श्रीकृष्ण स्वधर्म ( 2.31-2.37) की व्याख्या करते हैं और वे अर्जुन को बताते हैं कि इस तरह की अनचाही लड़ाई स्वर्ग का द्वार खोलती है ( 2.32) और इससे भागने से स्वधर्म और प्रसिद्धि की हानि होगी और पाप होगा ( 2.33) । युद्ध के मैदान में अर्जुन को दी गई इस सलाह को सही सन्दर्भ में समझने की आवश्यकता है। श्रीकृष्ण वास्तव में स्वधर्म के साथ समन्वय और तालमेल की बात कर रहे हैं , न कि युद्ध के बारे में। श्रीकृष्ण अर्जुन के स्वधर्म और उसके विचारों , वचनों तथा कर्मों के बीच असामंजस्य पाते हैं। वे अर्जुन को इनमें सामंजस्य लाने का मार्ग दिखाते हैं। अर्जुन के लिए सामंजस्य उसके स्वधर्म के अनुसार युद्ध करने में है जबकि युद्ध से बचने में असामंजस्य है। वास्तव में समन्वय सृष्टि का नियम है जहाँ सबसे छोटे ‘इलेक्ट्रॉन’ , ‘ प्रोटॉन’ और ‘न्यूट्रॉन’ से लेकर सबसे बड़ी आकाशगंगा , ग्रह और तारे सामंजस्य में हैं। हम अपने पसंदीदा संगीत का आनन्द तभी ले पाते हैं जब रेडियो और रेडियो स्टेशन सामंजस्य (धुन) में हों। मानव शरीर से बढ़कर समन्वय का कोई उदाहरण नहीं है। कई अंगों और रसायनों का साथ मिलकर काम करना...