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225. शास्त्र एवं स्वधर्म

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  भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय का शीर्षक है ‘ दैव-असुर सम्पद विभाग योग ’ जिसका अर्थ है दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों के भेद के माध्यम से परमात्मा से एकत्व की प्राप्ति । जहाँ ‘ दैवी ’ प्रवृत्ति परमात्मा की ओर आंतरिक यात्रा है वहीँ दूसरी ओर , ‘ आसुरी ’ प्रवृत्ति परमात्मा से दूर जाने की यात्रा है। श्रीकृष्ण ने इन दोनों स्वभावों का विस्तार से वर्णन किया ताकि हम अपनी प्रवृत्तियों को पहचान सकें और उसी के अनुसार अपने मार्ग में सुधार कर सकें। श्रीकृष्ण ने अध्याय के अंत में कहा कि जो लोग इच्छा के आवेग में शास्त्रों के आदेशों को त्यागकर कर्म करते हैं , उन्हें न तो पूर्णता प्राप्त होती है , न ही सुख और न ही जीवन में सर्वोच्च लक्ष्य। यह तय करने के लिए कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, श्रीकृष्ण शास्त्रों को अपना मार्गदर्शक मानने, शास्त्रों के आदेशों को समझकर उसी के अनुसार इस संसार में अपने कर्म करने की सलाह देते हैं। भगवद्गीता ऐसा ही एक महान शास्त्र है जिसे स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने मानवता के कल्याण के लिए प्रदान किया है। हमें इसे अपना मार्गदर्शक बनाना चाहिए। भगवद्गीता के सत्रहवें...