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Showing posts from July, 2026

219. बन्धन से मुक्ति

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  श्रीकृष्ण कहते हैं “तेज (चारित्रिक तेज) , क्षमा , धैर्य , पवित्रता , शत्रुभाव का न होना और प्रतिष्ठा की इच्छा से मुक्त होना ; ये सब दिव्य प्रवृत्ति से संपन्न लोगों के दैवीय गुण हैं (16.3)। दम्भ , अहंकार , अभिमान , क्रोध , कठोरता और अज्ञानता उस व्यक्ति के लक्षण हैं , जो आसुरी प्रवृत्ति के साथ जन्म लेता है ( 16.4) । संसार में दो प्रकार के प्राणी हैं -एक वे जो दैवीय गुणों से सम्पन्न हैं और दूसरे वे जो आसुरी प्रवृत्ति के हैं (16.6)। दैवीय प्रवृत्ति मोक्ष प्रदान करती है ; जबकि आसुरी प्रवृत्ति निरन्तर बन्धन की नियति का कारण हो ती है” (16.5)। चूँकि मुक्ति और बन्धन अनुभवजन्य हैं , इसलिए उनके बारे में कोई भी व्याख्या स्पष्टता प्रदान करने में असमर्थ है। फँसे हुए बंदर की कहानी हमें बन्धन और मुक्ति के बीच के द्वैत को समझने में मदद करेगी। एक संकरे मुँह वाले सुराही में कुछ मेवे रखे जाते हैं जिसमें बंदर का हाथ मुश्किल से समा पाता है। बंदर सुराही के मुँह से अपना हाथ अन्दर डालता है और मुट्ठी भर मेवे पकड़ लेता है। मुट्ठी भर जाने पर उसका आकार बढ़ जाता है , इसलिए वह सुराही से बाहर नहीं निकल पा...

218. अहिंसा

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  श्रीकृष्ण कहते हैं “अहिंसा , सत्य , अक्रोध , त्याग , शांति , निन्दा न करना , सभी प्राणियों पर दया , लोभ से मुक्ति , नम्रता , विनयशीलता , स्थिरता ये सब दैवीय गुण हैं ” (16.2)। जबकि अहिंसा भी एक दिव्य गुण है , कुरुक्षेत्र का हिंसक युद्ध एक बड़ी बाधा है , जिसे भगवद्गीता को समझने के लिए पार करने की आवश्यकता है। सबसे पहले इस विरोधाभास का उत्तर श्रीकृष्ण ने पहले ही दे दिया था जब उन्होंने अर्जुन से कहा था कि यदि वह सुख-दुःख , लाभ-हानि और जीत-हार के बीच आंतरिक संतुलन बनाए रखते हुए युद्ध लड़ेगा तो उसे कोई पाप नहीं लगेगा (2.38)। यह आंतरिक संतुलन या समत्व , अहिंसा के अलावा और कुछ नहीं है। अक्रोध (क्रोध से मुक्ति) एक और दैवीय गुण है , जो इस आंतरिक संतुलन का परिणाम है। दूसरी ओर असंतुलन से उत्पन्न कोई भी कार्य हिंसा है। जब हम किसी व्यक्ति , वस्तु या अनुभव के प्रति आसक्त हो जाते हैं तो उसके खोने की संभावना भय , विरोध और संघर्ष को जन्म देती है। ये हिंसा के सूक्ष्म रूप हैं। इस दृष्टि से “मेरा” का भाव ही हिंसा की जड़ में स्थित है। आसक्ति और अहंकार -दोनों इसी स्वामित्व-बोध से उत्पन्न होते ह...

217. दान व्यापार नहीं है

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  श्रीकृष्ण ने अंतःकरण शुद्धि (आंतरिक पवित्रता) , ज्ञानयोग में दृढ़ता , दान , इन्द्रियों पर नियंत्रण , यज्ञ , स्वाध्याय (स्वयं का अध्ययन) और सत्यनिष्ठा को कुछ दैवी गुणों के रूप में वर्णित किया है (16.1)। इन्द्रियों पर नियंत्रण भगवद्गीता का एक सामान्य सूत्र है। यद्यपि इन्द्रियाँ हमारे अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं , फिर भी वे इच्छाएँ उत्पन्न करके हमें बाँधती हैं जिसके परिणामस्वरूप हम मुक्ति के दिव्य मार्ग से भटक जाते हैं। आंतरिक शुद्धता को इससे पहले अध्यात्म कहा गया है और स्वभाव (आंतरिक प्रकृति) के रूप में परिभाषित किया गया है ( 8.3) । यद्यपि सभी लोग जन्म के समय शुद्ध हो ते हैं , फिर भी बाद में समाज और परिवार द्वारा विभाजन के रूप में अशुद्धियाँ थोपी जाती हैं। परिणामस्वरूप कुछ लोगों के लिए मांसाहारी भोजन स्वीकार्य नहीं है लेकिन अन्य के लिए यह स्वीकार्य है। चचेरे भाई से विवाह करना कुछ संस्कृतियों में स्वीकार्य है और अन्य में निषिद्ध है ; एक ही परमात्मा की प्रार्थनाएँ बिल्कुल भिन्न हैं और कभी-कभी विरोधाभासी प्रतीत होती हैं ; यह सूची अंतहीन है। शुद्धता प्राप्त करना इन विभाजनों को दूर क...