54. आध्यात्मिकता का कारण और प्रभाव
श्रीकृष्ण कहते हैं संतुष्ट व्यक्ति की बुद्धि स्थिर होती है और उसके समस्त दुःख नष्ट हो जाते हैं (2.65)। दुःख चंचल बुद्धि का परिणाम है और जब बुद्धि स्थिर हो जाती है तब दुःख स्वतः समाप्त हो जाता है। यह श्लोक हमारी उस सामान्य धारणा के विपरीत है कि इच्छाओं की पूर्ति होने पर , सुख प्राप्त होने पर और दुःख समाप्त होने पर ही हम संतुष्ट होते हैं। किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं हमें पहले संतुष्ट होना सीखना चाहिए ; शेष सब उसके बाद स्वतः घटित हो जाएगा। उदाहरण के लिए हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि बुखार , दर्द आदि जैसे लक्षण होने पर हम स्वस्थ नहीं हैं। इन लक्षणों का दमन हमें तब तक स्वस्थ नहीं करेगा जब तक इन लक्षणों के जड़ का इलाज नहीं किया जाता है। वहीं दूसरी ओर पौष्टिक आहार , अच्छी नींद , फिटनेस व्यवस्था आदि हमें अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करते हैं। इसी तरह भय , क्रोध और द्वेष जो दु:ख का हिस्सा हैं , संतोष की कमी के संकेत हैं और उनका दमन हमें अपने आप संतुष्ट नहीं करेगा। इन संकेतों को दबाकर स्वीकार्य व्यवहार करने के लिए कई त्वरित सुधारों का अभ्यास किया जाता है। लेकिन यह दमन बाद में और अधिक ...