55. मध्य में केंद्रित
श्रीकृष्ण कहते हैं अयुक्त (अस्थिर) मनुष्य में निश्चयात्मिका बुद्धि और निष्काम भावना दोनों नहीं होती है और परिणामस्वरूप उसे शांति नहीं मिलती और अशांत व्यक्ति के लिए कोई सुख नहीं होता ( 2.66) । श्रीकृष्ण ने समत्व ( 2.38 एवं 2.48) पर जोर दिया और यह श्लोक एक अलग दृष्टिकोण से उसी पर प्रकाश डालता है। जब तक व्यक्ति मध्य में केंद्रित नहीं होता , तब तक वह मित्र , शत्रु , कार्य , जीवनसाथी , संतान , धन , सुख , शक्ति , संपत्ति आदि जैसे कुछ केंद्रों में स्वयं को स्थिर कर लेता है और यही अयुक्त की पहचान है। यदि कोई धन पर केंद्रित है तो उसकी सभी योजनाएँ - रिश्ते , स्वास्थ्य जैसी चीजों की कीमत पर धन को अधिकतम करने के इर्द-गिर्द घूमती हैं। सुख जिसका केंद्र है वह सुख प्राप्त करने के लिए धोखा देने से लेकर कुछ भी करने से नहीं हिचकिचाता है। जीवनसाथी के प्रति उन्मुख व्यक्ति , उनके जीवनसाथी के साथ लोगों के व्यवहार के आधार पर रिश्तों का मूल्यांकन करता है। जो शत्रु केंद्रित है वह अपने शत्रुओं को नुकसान पहुँचाने में लगा रहता है भले ही इससे उसका खुद का नुकसान हो रहा हो। जब हम दूसरों से बंधे (जुड़े)...