48. राग, भय और क्रोध
श्रीकृष्ण कहते हैं स्थितप्रज्ञ वह है जो न तो सुख से लगाव रखता है और न ही दु:ख से विक्षुब्ध होता है ( 2.56) । वह राग , भय और क्रोध से मुक्त होता है। यह श्लोक 2.38 का विस्तार है जहाँ श्रीकृष्ण सुख और दु:ख ; लाभ और हानि ; और जय और पराजय को समान रूप से मानने को कहते हैं। श्रीकृष्ण उद्वेग से मुक्त रहने को अत्यन्त महत्त्व देते हुए कहते हैं कि जो भक्त न तो जगत् को उद्विग्न करता है और न ही स्वयं जगत् से उद्विग्न होता है , वह उन्हें प्रिय है ( 12.15) । हम सभी सुख की तलाश करते हैं लेकिन हमारे जीवन में दु:ख आता है क्योंकि ये दोनों द्वंद्व के रूप में स्थित रहते हैं। यह मछली पकड़ने के लिए चारे की तरह है जहाँ चारे के पीछे कांटा छिपा होता है। स्थितप्रज्ञ वह है जो इन द्वन्द्वों को पार कर द्वंद्वातीत हो जाता है। यह जागरूकता है कि जब हम एक की तलाश करते हैं तो दूसरा अनुसरण करने के लिए बाध्य होता है , भले ही किसी अलग रूप में और कुछ समय के अंतराल के बाद। जब हमें अपनी योजना के अनुसार सुख प्राप्त होता है , अहंकार प्रफुल्लित हो जाता है। लेकिन जब सुख के बाद दुःख आता है तो अहंकार को ठेस पहुँचती ...