188. अस्तित्व के अनुरूप
श्रीकृष्ण कहते हैं “ जिनके लिए स्तुति और निंदा समान हैं , जो मौन रहते हैं , जो मिल जाए उसमें संतुष्ट रहते हैं , जो रहने की जगह से बंधे नहीं हैं , जिनकी बुद्धि दृढ़तापूर्वक मुझमें स्थिर रहती है ; जो भक्त यहाँ बताए गए इस अमृत रूपी ज्ञान (धर्म) का पालन करते हैं , जो श्रद्धा के साथ तथा निष्ठापूर्वक मुझे अपना परम लक्ष्य मानकर मुझ पर समर्पित होते हैं , वे मुझे अति प्रिय हैं ” (12.19 और 12.20)। प्रशंसा और निंदा अहंकार के खेल के अलावा कुछ नहीं है। अहंकार प्रशंसा से प्रफुल्लित होता है और निंदा से आहत होता है। जब हम स्वयं में केंद्रित होते हैं , जिसे श्रीकृष्ण ने पहले आत्मवान् कहा था , तब प्रशंसा और निंदा हम पर प्रभाव डालने की अपनी क्षमता खो देते हैं। यह भगवद्गीता के 12वें अध्याय ' भक्तियोग ' का समापन करता है। सहज आचरण के लिए भगवान् श्रीराम के द्वारा अपने भक्त शबरी को बताए गए भक्ति के नौ मार्ग रामायण में उल्लेखित हैं। इनमें सत्संग , कथा , सेवा , कीर्तन , जप आदि शामिल हैं। ये आज भी प्रासंगिक हैं और प्रचलित हैं। यह अध्याय अर्जुन के इस प्रश्न से प्रारंभ होता है कि निराकार / निर्गुण भक्...